भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 617, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 617

अर्धमासाश्च मासाश्चार्तवा ऋतुभिः सह. उच्छिष्टे घोषिणीरापः स्तनयित्नुः श्रुतिर्मही.. (२०) आधा महीना अर्थात् पक्ष, महीने, ऋतुओं के साथ उन में उत्पन्न होने वाले पदार्थ, शब्द करने वाले जल, गर्जन करते हुए मेघ और पवित्र भूमि—ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (२०) शर्कराः सिकता अश्मान ओषधयो वीरुधस्तृणा. अभ्राणि विद्युतो वर्षमुच्छिष्टे संश्रिता श्रिता.. (२१) पत्थरों के छोटे टुकड़े, बालू, पत्थर, जड़ीबूटी और फसलें, लताएं, तिनके, मेघ, बिजलियां और वर्षा ये सब यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (२१) राद्धिः प्राप्तिः समाप्तिर्व्याप्तिर्मह एधतुः. अत्याप्तिरुच्छिष्टे भूतिश्चाहिता निहिता हिता.. (२२) सिद्धि, प्राप्ति, समाप्ति, व्याप्ति, तेज, वृद्धि, अत्यधिक प्राप्ति, समृद्धि तथा सामने स्थित हितकारी पदार्थ यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित है. (२२) यच्च प्राणति प्राणेन यच्च पश्यति चक्षुषा. उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२३) जो प्राण वायु के द्वारा जीवित रहता है, जो आंखों से देखता है, स्वर्ग में स्थित देव और स्वर्ग—ये सभी यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न है. (२३) ऋचः सामानि च्छन्दांसि पुराणं यजुषा सह. उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२४) ऋग्वेद और सामवेद के मंत्र, छंद, यजुर्वेद के सहित प्राचीन मंत्र, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव—ये सभी यज्ञ रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (२४) प्राणापानौ चक्षुः श्रोत्रमक्षितिश्च क्षितिश्च या. उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२५) प्राण और अपान वायु, नेत्र, कान, विनाश का अभाव और विनाश, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव—ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (२५) आनन्दा मोदाः प्रमुदोऽभीमोदमुश्च ये. उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२६) विषयों के उपभोग से उत्पन्न आनंद नाम के विशेष सुख, हर्ष, अधिक प्रसन्नता एवं इन्हें ebook converter DEMO Watermarks*

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