भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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पृष्ठ 636

गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तो ऽ रण्यं ते पृथिवि स्योनमस्तु. बभ्रुं कृष्णां रोहिणीं विश्वरूपां ध्रुवां भूमिं पृथिवीमिन्द्रगुप्ताम्. अजीतो ऽ हतो अक्षतो ऽ ध्यष्ठां पृथिवीमहम्.. (११) हे पृथ्‍वी! तेरे बर्फ से ढके हुए पर्वत एवं घने वन हमें सुख प्रदान करें. मैं इंद्र देव के द्वारा सुरक्षित पृथ्‍वी पर इस प्रकार प्रतिष्ठित रहूं कि न मेरा विनाश हो तथा न मैं किसी से परिचित होऊं. (११) यत् ते मध्यं पृथिवि यच्च नभ्यं यास्त ऊर्जास्तन्वःसंबभूवुः. तासु नो धेह्यभि नः पवस्य माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः. पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु.. (१२) हे पृथ्‍वी! तेरी नाभि अर्थात् मध्य भाग से सभी के शरीरों को पुष्ट करने वाले जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं, मुझे उन्हीं के मध्य स्थित करो. भूमि मेरी माता है और मेघ मेरे पिता हैं. ये दोनों यज्ञ कर्म को पूर्ण करते हैं. (१२) यस्यां वेदिं परिगृह्णन्ति भूम्यां यस्यां यज्ञं तन्वते विश्वकर्माणः. यस्यां मीयन्ते स्वरवः पृथिव्यामूर्ध्वाः शुक्रा आहुत्याः पुरस्तात्. सा नो भूमिर्वर्धयद् वर्धमाना.. (१३) यज्ञ में आहुति देने से पूर्व ही जिस पृथ्वी पर लकड़ी के स्तंभ गाढ़े जाते हैं, वह पृथ्वी स्वयं वृद्धि को प्राप्त कर के हमें समृद्धिशाली बनाए. (१३) यो नो द्वेषत् पृथिवि यः पृतन्याद् यो ऽ भिदासान्मनसा यो वधेन. तं नो भूमे रन्धय पूर्वकृत्वरि.. (१४) हे पृथ्‍वी! हम से द्वेष करता हुआ जो सेना ले कर हमें क्षीण करना अथवा मारना चाहे, तुम हमारी रक्षा के लिए उस का विनाश कर दो. (१४) त्वज्जातास्त्वयि चरन्ति मर्त्यास्त्वं बिभर्षि द्विपदस्त्वं चतुष्पदः. तवेमे पृथिवि पञ्च मानवा येभ्यो ज्योतिरमृतं मर्त्येभ्य उद्यन्सूर्यो रश्मिभिरातनोति.. (१५) हे पृथ्‍वी! जो प्राणी तुम्हारे ऊपर जन्म लेते हैं, वे तुम्हारे ही ऊपर भ्रमण करते है. तुम जिन चार पैरों वाले पशुओं तथा दो पैरों वाले मनुष्यों का पोषण करती हो, उन के लिए सूर्य अपनी किरणों के द्वारा जीवन पर्यंत अमृतमयी ज्योति फैलाता है. (१५) ता नः प्रजाः सं दुहतां समग्रा वाचो मधु पृथिवि धेहि मह्यम्.. (१६) हे पृथ्‍वी! सूर्य की किरणें हमारे हेतु प्रजा अर्थात् संतान और सेवक वर्ग के अतिरिक्त ebook converter DEMO Watermarks*