अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 637, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंसभी प्रकार की वाणी प्रदान करें. हे पृथ्वी! तुम मुझे मधुर पदार्थ प्रदान करो. (१६) विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं धर्मणा धृताम्. शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा.. (१७) हम ऐसी पृथ्वी पर सदा विचरण करते रहें जो ओषधियों को उत्पन्न करने वाली, संसार की ऐश्वर्य रूप, धर्म के द्वारा आश्रित कल्याणमयी एवं सुख देने वाली है. (१७) महत् सधस्थं महती बभूविथ महान् वेग एजथुर्वेपथुष्टे. महांस्तेवेन्द्रो रक्षत्यप्रमादम्. सा नो भूमे प्र रोचय हिरण्यस्येव संदृशि मा नो द्विक्षत कश्चन.. (१८) हे पृथ्वी! तू महती निवास भूमि है. तेरा वेग और कंपन भी भाव पूर्ण है. वे इंद्र तेरे रक्षक हैं. तू हमें सब का प्रिय बनाए. जिस प्रकार स्वर्ग सब को प्रिय होता है, उसी प्रकार हमारा द्वेषी कोई न हो अर्थात् हम सब के प्रिय बनें. (१८) अग्निर्भूम्यामोषधीष्वग्निमापो बिभ्रत्यग्निरश्मसु. अग्निरन्तः पुरुषेषु गोष्वश्वेष्वग्नयः.. (१९) जल अग्नि को धारण करता है. पृथ्वी में अग्नि है. जल में, पुरुष में, मेरे अश्वादि पशुओं में भी अग्नि है. (१९) अग्निर्दिव आ तपत्यग्नेर्देवस्योर्व १ न्तरिक्षम्. अग्निं मर्तास इन्धते हव्यवाहं घृतप्रियम्.. (२०) अग्नि देव स्वर्ग में तपते हैं, अंतरिक्ष में भी हैं और मरण धर्म वाले मनुष्य हमारी अग्नि को प्रदीप्त करते हैं. (२०) अग्निवासाः पृथिव्य सितज्ञूस्त्विषीमन्तं संशितं मा कृणोतु.. (२१) जिस धूम में अग्नि का वास है, उस धूम को जानने वाली पृथ्वी मुझे तेजस्वी बनाए. (२१) भूम्यां देवेभ्यो ददति यज्ञं हव्यमरंकृतम्. भूम्यां मनुष्या जीवन्ति स्वधयान्नेन मर्त्याः. सा नो भूमिः प्राणमायुर्दधातु जरदष्टिं मा पृथिवी कृणोतु.. (२२) पृथ्वी पर जो यज्ञ सुशोभित हैं, उन में देवों के हेतु हवि प्रदान की जाती है. इसी पृथ्वी पर मरणधर्मा जीव अन्न जल से अपना जीवन व्यतीत करते हैं. यह पृथ्वी हम को प्राण और आयु प्रदान करती हुई वृद्धावस्था तक जीवित रहने वाला बनाए. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*