भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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पृष्ठ 638

यस्ते गन्धः पृथिवि संबभूव यं बिभ्रत्योषधयो यमापः. यं गन्धर्वा अप्सरसश्च भेजिरे तेन मा सुरभिं कृणु मा नो द्विक्षत कश्चन.. (२३) हे पृथ्वी! तेरी जिस गंध को ओषधियां और जल धारण करते हैं, जिस का सेवन गंधर्व और अप्सराएं करती हैं, तू मुझे उसी गंध से सुशोभित बना. कोई मेरा वैरी न रहे. (२३) यस्ते गन्धः पुष्करमाविवेश यं संजभुः सूर्याया विवाहे. अमर्त्याः पृथिवि गन्धमग्रे तेन मा सुरभिं कृणु मा नो द्विक्षत कश्चन.. (२४) हे पृथ्वी! तुम्हारी जो गंध कमल में है, जिस गंध को सूर्य के विवाहोत्सव में मरणधर्मा जीवों को धारण किया था, उस गंध से मुझे सुगंधित बना. मुझ से द्वेष करने वाले कोई न रहे. (२४) यस्ते गन्धः पुरुषेषु स्त्रीषु पुंसु भगो रुचिः. यो अश्वेषु वीरेषु यो मृगेषूत हस्तिषु. कन्यायां वर्चो यद् भूमे तेनास्माँ अपि सं सृज मा नो द्विक्षत कश्चन.. (२५) हे पृथ्वी! तुम्हारी जो गंध स्त्रीपुरुषों में, घोड़ों में, वीरों में, मृग में, हाथी में तथा कन्या में है, मुझे उन सब की गंध से संपन्न बना. मुझ से द्वेष करने वाला कोई न रहे. (२५) शिला भूमिरश्मा पांसुः मा भूमिः संधृता धृता. तस्यै हिरण्यवक्षसे पृथिव्या अकरं नमः.. (२६) जो पृथ्वी शिला, भूमि, पत्थर और धूल के रूपों को धारण करती है, ऐसी पृथ्वी हिरण्यवक्षा अर्थात् सोने के सीने वाली है. मैं उस पृथ्वी को नमस्कार करता हूं. (२६) यस्यां वृक्षा वानस्पत्या ध्रुवास्तिष्ठन्ति विश्वहा. पृथिवीं विश्वधायसं धृतामच्छावदामसि.. (२७) वनस्पतियां उत्पन्न करने वाले वृक्ष जिस भूमि पर अडिग रूप में खड़े रहते हैं, वे वृक्ष औषधालय के रूप में सब की सेवा करते हैं. ऐसी धर्म आश्रिता पृथ्वी की हम स्तुति करते हैं. (२७) उदीराणा उतासीनास्तिष्ठन्तः प्रक्रामन्तः. पद्भ्यां दक्षिणसव्याभ्यां मा व्यथिष्महि भूम्याम्.. (२८) हम अपने दाएं अथवा बाएं पैर से चलते हुए, बैठते अथवा खड़े होते हुए कभी व्यथित न हों. (२८) ebook converter DEMO Watermarks*