भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 642, कुल 1063 में से

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नो मृड.. (४७) हे पृथ्वी! मनुष्यों के चलने के और रथ आदि के चलने के जो मार्ग हैं, उन मार्गों पर धर्मात्मा और पापात्मा दोनों प्रकार के मनुष्य चलते हैं. जो मार्ग चोरों और शत्रुओं से हीन है, उसी कल्याणमय मार्ग के द्वारा तुम हमें सुखी बनाओ. (४७) मत्वं बिभ्रती गुरुभृद् भद्रपापस्य निधनं तितिक्षुः. वराहेण पृथिवी संविदाना सूकराय वि जिहीते मृगाय.. (४८) पुण्य एवं पाप कर्म करने वालों के शवों को तथा शत्रु को भी धारण करने वाली जिस पृथ्वी को वाराह खोज रहे थे, वह पृथ्वी उन वाराह को ही प्राप्त हुई थी. (४८) ये त आरण्याः पशवो मृगा वने हिताः सिंहा व्याघ्राः पुरुषादश्चरन्ति. उलं वृकं पृथिवि दुच्छुनामित ऋक्षीकां रक्षो अप बाधयास्मत्.. (४९) जो व्याघ्र आदि हिंसक पशु घूमते हैं, उन को और व्रक अर्थात् भेड़ियों, भालुओं और राक्षसों को हम से दूर कर के बाधा पहुंचाओ. (४९) ये गन्धर्वा अप्सरसो ये चारायः किमीदिनः. पिशाचान्त्सर्वा रक्षांसि तानस्मद् भूमे यावय.. (५०) हे पृथ्वी! गंधर्व, अप्सरा, राक्षस, मांसभक्षी, पिशाच आदि को हम से दूर करो. (५०) यां द्विपादः पक्षिणः संपतन्ति हंसाः सुपर्णाः शकुना वयांसि. यस्यां वातो मातरिश्वैयते रजांसि कृण्वंश्च्यावयंश्च वृक्षान्. वातस्य प्रवामुपवामनु वात्यर्चिः.. (५१) जिस पृथ्वी पर दो पांवों वाले पक्षी हंस, कौवे, गिद्ध आदि घूमते हैं, जिस पृथ्वी पर वायु धूल उड़ाती और वृक्षों को गिराती है तथा वायु के तीक्ष्ण होने पर अग्नि भी उस के साथ चलती है. (५१) यस्यां कृष्णमरुणं च संहिते अहोरात्रे विहिते भूम्यामधि. वर्षेण भूमिः पृथिवी वृतावृता सा नो दधातु भद्रया प्रिये धामनिधामनि.. (५२) जिस पृथ्वी पर काले और लाल दिनरात मिले रहते हैं, जो पृथ्वी वर्षा से ढकी रहती है, वह पृथ्वी सुंदर चित्त वृत्ति से हमें प्रिय स्थान प्राप्त कराए. (५२) द्यौश्च म इदं पृथिवी चान्तरिक्षं च मे व्यचः. अग्निः सूर्य आपो मेधां विश्वे देवाश्च सं ददुः.. (५३) ebook converter DEMO Watermarks*