भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 643, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 643

आकाश, पृथ्वी, अंतरिक्ष, अग्नि, सूर्य, जल, मेघ तथा सब देवताओं ने मुझे चलने की शक्ति प्रदान की है. (५३) अहमस्मि सहमान उत्तरो नाम भूम्याम्. अभीषाडस्मि विश्वाषाडाशामाशां विषासहि:.. (५४) मैं पृथ्वी पर शत्रु का तिरस्कार करने वाले के रूप में प्रसिद्ध हूं. मैं अपने शत्रुओं के सामने जा कर उन्हें दबाऊं. मैं हर दिशा में रहने वाले शत्रु को भलीभांति वश में कर लूं. (५४) अदो यद् देवि प्रथमाना पुरस्ताद् देवैरुक्ता व्यसर्पो महित्वम्. आ त्वा सुभूतमविशत् तदानीमकल्पयथाः प्रदिशश्चतस्रः.. (५५) हे पृथ्वी! तुम्हारे विस्तृत होने से पहले देवताओं ने तुम से विस्तार वाली होने को कहा था. उस समय तुम में भूतों ने प्रवेश किया. तभी चार दिशाएं बनाई गईं. (५५) ये ग्रामा यदरण्यं याः सभा अधि भूम्याम्. ये संग्रामाः समितयस्तेषु चारु वदेम ते.. (५६) पृथ्वी पर जो गांव, जंगल और सभाएं हैं, जो युद्ध की मंत्रणाएं हैं तथा जो युद्ध होते हैं, हे भूमि! हम उन सब में तेरी वंदना करते हैं. (५६) अश्व इव रजो दुधुवे वि तान् जनान् य आक्षियन् पृथिवीं यादजायत. मन्द्राग्रेत्वरी भुवनस्य गोपा वनस्पतीनां गृभिरोषधीनाम्.. (५७) पृथ्वी में उत्पन्न हुए पदार्थ पृथ्वी पर ही रहते हैं तथा अश्व के समान उस पर धूल उड़ाते हैं. यह भूमि भद्रा और उर्वरा हैं. यह वनस्पतियों तथा ओषधियों के प्रभाव से लोक का पालन करने वाली है. (५७) यद् वदामि मधुमत् तद् वदामि यदीक्षे तद् वनन्ति मा. त्विषीमानस्मि जुतिमानवान्यान् हन्मि दोधतः.. (५८) मैं जो कुछ कहूं, वह मधुर हो, मैं जिसे देखूं, वही मेरा प्रिय हो जाए. मैं यशस्वी और वेग वाला बनूं. मैं दूसरों का रक्षक होता हुआ उन का संहार करूं जो मुझे कंपित करें. (५८) शन्तिवा सुरभिः स्योना कीलालोध्‍नी पयस्वती. भूमिरधि ब्रवीतु मे पृथिवी पयसा सह.. (५९) सुख और शांति प्रदान करने वाली, अन्न और दूध देने वाली, दूध के समान सार पदार्थों वाली होती हुई पृथ्वी मेरे पक्ष में रहे. (५९) यामन्वैच्छद्धविषा विश्वकर्मान्तर्णवे रजसि प्रविष्टाम्. ebook converter DEMO Watermarks*