अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 649, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिः सप्त कृत्व ऋषयः परेता मृत्युं प्रत्यौहन् पदयोपनेन.. (२९) परलोक गमन में वायु से पूर्ण उत्तरायण मार्ग में जाने वाले ऋषियों ने निकृष्ट मार्गों को लांघा था. उन्होंने मृत्यु को भी इक्कीस बार पार किया था. (२९) मृत्योः पदं योपयन्त एत द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः. आसीना मृत्युं नुदता सधस्थे ऽ थ जीवासो विदथमा वदेम.. (३०) मृत्यु के लक्ष्य को भ्रमित करने वाले ऋषि आयु से परिपूर्ण हैं. तुम भी इस मृत्यु को भगाओ. फिर हम जीवन में यज्ञ की स्तुति करें. (३०) इमा नारीरविधवाः सुपत्नीराञ्जनेन सर्पिषां सं स्पृशन्ताम्. अनश्रवो अनमीवाः सुरत्ना आ रोहन्तु जनयो योनिमग्रे.. (३१) ये स्त्रियां सुंदर पतियों से युक्त रहें. ये विधवा न हों. ये अश्रुओं से रहित और घृत से युक्त हों. ये सुंदर अलंकारों को धारण करने वाली हों तथा संतानोत्पत्ति के हेतु मनुष्य योनि में ही रहें. (३१) व्याकरोमि हविषाहेमतौ तौ ब्रह्मणा व्य१हंकल्पयामि. स्वधां पितृभ्यो अजरां कृणोमि दीर्धेणायुषा समिमान्त्सृजामि.. (३२) मैं उन दोनों को मंत्र शक्ति के द्वारा सामर्थ्य वाला बनाता हूं. मैं पितरों की स्वधा को जीर्णता युक्त करता हुआ उन्हें दीर्घ आयु वाला बनाता हूं. (३२) यो नो अग्निः पितरो हृत्स्व १ न्तराविवेशामृतो मर्त्येषु. मय्यहं तं परि गृह्णामि देवं मा सो अस्मान् द्विक्षत मा वयं मत्.. (३३) हे पितरो! नष्ट न होने वाले फल को देने वाले अग्नि हमारे हृदय में विराजमान हैं. वे हम सब से द्वेष करने वाले न हों. हम भी उन के प्रति द्वेष न करें. (३३) अपावृत्य गार्हपत्यात् क्रव्यादा प्रेत दक्षिणा. प्रियं पितृभ्य आत्मने ब्रह्मभ्यः कृणुता प्रियम्.. (३४) हे प्राणियो! मंत्रों के द्वारा इस गार्हपत्य अग्नि से दूर हटो तथा क्रव्याद अग्नि से दक्षिण दिशा को जाओ. वहां तुम्हारे लिए और पितरों के लिए जो प्रिय हो, वही कार्य करो. (३४) द्विभागधनमादाय प्र क्षिणात्यवर्त्या. अग्निः पुत्रस्य ज्येष्ठस्य यः क्रव्यादनिराहितः.. (३५) जो पुरुष क्रव्याद अग्नि को नहीं छोड़ता, वह अपने ज्येष्ठ पुत्र को तथा अपने धन को लेता हुआ क्षय का पात्र होता है. (३५) ebook converter DEMO Watermarks*