अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 684, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंवाचस्पत ऋतवः पञ्च ये नौ वैश्वकर्मणाः परि ये संबभूवुः. इहैव प्राणः सख्ये नो अस्तु तं त्वा परमेष्ठिन् परि रोहित आयुषा वर्चसा दधातु.. (१८) हे वाचस्पति! हमारे कर्म के द्वारा जो पांच ऋतुएं उत्पन्न हुई हैं, उन में हमारा हमारा प्राण मित्र के भावों से स्थिर रहे. हे प्रजापति! सूर्य तुम्हें अपने तेज और आयु से धारण करे. (१८) वाचस्पते सौमनसं मनश्च गोष्ठे नो गा जनय योनिषु प्रजाः. इहैव प्राणः सख्ये नो अस्तु तं त्वा परमेष्ठिन् पर्यहमायुषा वर्चसा दधामि.. (१९) हे वाचस्पति! हमारा मन प्रसन्न रहे. तुम हमारे गोष्ठ में गायों को प्रकट करो तथा हमारी पत्नियों में संतान को उत्पन्न करो. प्राण हमारे साथ मित्र भाव से रहे. मैं आयु और तेज से तुम्हें धारण करता हूं. (१९) परि त्वा धात् सविता देवो अग्निर्वर्चसा मित्रावरुणावभि त्वा. सर्वा अरातीरवक्रामन्नेहीदं राष्ट्रमकरः सूनृतावत्.. (२०) हे राजन्! सविता देव तुम्हें सभी ओर से पुष्ट करें. अग्नि, मित्र और वरुण तुम्हें पुष्ट बनाएं. तुम सभी शत्रुओं को वश में करते हुए इस राष्ट्र में आ कर सच्ची और प्रिय वाणी बोलो. (२०) यं त्वा पृषती रथे प्रष्टिर्वहति रोहित. शुभा यासि रिणन्नपः.. (२१) हे सूर्य! हिरणियों का समूह तुम्हें रथ में धारण करता है. तुम जलों में चलते हुए कल्याण के निमित्त गति करते हो. (२१) अनुव्रता रोहिणी रोहितस्य सूरिः सुवर्णा बृहती सुवर्चाः. तया वाजान् विश्वरूपां जयेम तया विश्वाः पृतना अभि ष्याम.. (२२) रोहिणी चढ़ते हुए से रोहित अर्थात् लाल वर्ण के सूर्य का अनुगमन करने वाली है. सुंदर वर्ण वाली वह बृहती सुंदर तेज वाली है. उसी के कारण हम विभिन्न रूपों वाले प्राणियों पर विजय प्राप्त करते हैं. उसी के कारण हम सेनाओं को अपने वश में करें. (२२) इदं सदो रोहिणी रोहितस्यासौ पन्थाः पृषती येन याति. तां गन्धर्वाः कश्यपा उन्नयन्ति तां रक्षन्ति कवयो ऽ प्रमादम्.. (२३) यह रोहिणी और रोहित का धाम है, पृषती इसी मार्ग से गमन करती है. उसे गंधर्व ऊपर ले जाते हैं. चतुर व्यक्ति सावधानी से इस की रक्षा करते हैं. (२३) ebook converter DEMO Watermarks*