अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 689, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो पुरुष सूर्य रूपी स्वर्ग की कामना करते हैं, वे मंत्रों के साथ आहुति दी गई तथा मंत्रों के द्वारा प्रवृद्ध की गई अग्नियों का पूजन करते हैं, उन्हें सदा प्रदीप्त रखते हैं. (४९) सत्ये अन्यः समाहितो ऽ प्स्व १ न्यूः समिध्यते. ब्रह्मोद्भावग्नी ईजाते रोहितस्य स्वर्विदः.. (५०) सत्य में अन्य अग्नियां समाहित हैं. जल में प्रदीप्त होने वाली अग्नियां इस से भिन्न हैं. सूर्यरूपी स्वर्ग की प्राप्ति की इच्छा करने वाले पुरुषों ने उन अग्नियों का पूजन किया है. जो मंत्रों के द्वारा बढ़ी है. (५०) यं वातः परिशुम्भति यं वेन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः. ब्रह्मोद्भावग्नी ईजाते रोहितस्य स्वर्विदः.. (५१) वायु, इंद्र तथा ब्रह्मणस्पति जिस पुरुष को सुशोभित करना चाहते हैं, वे पुरुष ही सूर्यात्मक स्वर्ग की प्राप्ति की कामना करते हुए मंत्रों द्वारा बढ़ी हुई अग्नि की पूजा करते हैं. (५१) वेदिं भूमिं कल्पयित्वा दिवं कृत्वा दक्षिणाम्. घ्रंसं तदग्निं कृत्वा चकार विश्वमात्मन्वद् वर्षेणाज्येन रोहितः.. (५२) रोहित ने पृथ्वी को वेदी बना कर, आकाश को दक्षिणा का रूप दे कर और दिन को अग्नि स्वीकार कर के वर्षा रूपी घृत से जगत् को आत्मा के समान बना लिया है. (५२) वर्षमाज्यं घ्रंसो अग्निर्वेदिर्भूमिंरकल्पत. तत्रैतान् पर्वतानग्निर्गीर्भीरूर्ध्वाँ अकल्पयत्.. (५३) पृथ्वी को वेदी, दिन को अग्नि और वर्षा को घृत बनाया गया. स्तुतियों के द्वारा समृद्ध हुए अग्नि देव ने ही इन पर्वतों को उन्नत किया है. (५३) गीर्भिरूर्ध्वान् कल्पयित्वा रोहितो भूमिमब्रवीत्. त्वयीदं सर्वं जायतां यद् भूतं यच्च भाव्यम्.. (५४) रोहित ने पृथ्वी को स्तुतियों से उन्नत करते हुए उस से कहा कि भूत और भविष्य जो कुछ हों, वे तुम से ही उत्पन्न हों. (५४) स यज्ञः प्रथमो भूतो भव्यो अजायत. तस्माद्ध जज्ञ इदं सर्वं यत् किं चेदं विरोचते रोहितेन ऋषिणाभृतम्.. (५५) यज्ञ की उत्पत्ति पहले भूत और भविष्यत के रूप में ही हुई. जो कुछ भी रोचमान है, वह सब पृथ्वी से ही प्रकट हुआ था. रोहित ने उसे पुष्ट किया. (५५) ebook converter DEMO Watermarks*