अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 688, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंआरोहन् द्यामृतः प्राव मे वचः. उत् त्वा यज्ञा ब्रह्मपूता वहन्त्यध्वगतो हरयस्त्वा वहन्ति.. (४३) हे सूर्य देव! तुम अमृत हो. सूर्यलोक में चढ़ते हुए तुम मेरे वचन की रक्षा करो. मंत्रमय यज्ञ और मार्गगामी अश्व तुम्हें वहन करते हैं. (४३) वेद तत् ते अमर्त्य यत् त आक्रमणं दिवि. यत् ते सधस्थं परमे व्योमन्.. (४४) हे अविनाशी सूर्य! द्युलोक में तुम्हारा स्थान है. तुम इस में गमन करते हो. मैं उस स्थान को जानता हूं. उपासकों सहित आकाश में तुम्हारा जो निवास स्थान है, उसे में भलीभांति जानता हूं. (४४) सूर्यो द्यां सूर्यः पृथिवीं सूर्य आपो ऽ ति पश्यति. सूर्यो भूतस्यैकं चक्षुरा रुरोह दिवं महीम्.. (४५) सूर्य देव आकाश, पृथ्वी और जल के साक्षी हैं. वे सभी प्राणियों की दर्शन शक्ति हैं. वे ही आकाश और पृथ्वी पर चढ़ते हैं. (४५) उर्वीरासन् परिधयो वेदिर्भूमिकल्पत. तत्रैतावग्नी आधत्त हिमं घ्रंसं च रोहितः.. (४६) भूमिरूपी वेदी पर यज्ञ का अनुष्ठान हुआ. इस यज्ञ की परिधियां विस्तृत थीं. वहीं पर शीतकाल और ग्रीष्म काल रूपी दो अग्नियों का आधान किया गया. (४६) हिमं घ्रंसं चाधाय यूपान् कृत्वा पर्वतान्. वर्षाज्यावग्नी ईजाते रोहितस्य स्वर्विदः.. (४७) सूर्यरूपी स्वर्ग को पाने की अभिलाषा वाले पुरुष हिम और ग्रीष्म रूपी दो अग्नियों का आधान कर के पर्वतों को यूप अर्थात् लकड़ी का खंभा बनाते हैं. वर्षा ऋतु रूपी घृत प्राप्त करने के लिए ये दोनों अग्नि तथा आज्य देव के हेतु यज्ञ करते हैं. (४७) स्वर्विदो रोहितस्य ब्रह्मणाग्निः समिध्यते. तस्माद् घ्रंसस्तस्माद्धिमस्तस्माद् यज्ञो ऽ जायत.. (४८) आत्मज्ञानी सूर्य संबंधी मंत्रों के द्वारा अग्नि को प्रदीप्त किया जाता है. उसी से हिम, दिवस और यज्ञ की उत्पत्ति हुई. (४८) ब्रह्मणाग्नी वावृधानौ ब्रह्मवृद्धौ ब्रह्माहुतौ. ब्रह्मोद्भावग्नी ईजाते राहितस्य स्वर्विदः.. (४९) ebook converter DEMO Watermarks*