भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 687, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 687

(३७) वसुजित, गोजित और साधनाजित नामक रोहित में आकाश और पृथ्वी स्थित हैं. मैं उन के सहस्र प्रादुर्भावों का वर्णन करता हुआ उन्हें लोक की महिमा का केंद्र मानता हूं. (३७) यशा यासि प्रदिशो दिशश्च यशाः पशूनामृत चर्षणीनाम्. यशाः पृथिव्या आदित्या उपस्थे ऽ हं भूयासं सवितेव चारुः.. (३८) हे सूर्य! तुम अपने यश के द्वारा दिशाओं और प्रदिशाओं में गमन करते हो. तुम अपने यश के द्वारा ही मनुष्यों और पशुओं में घूमते हो. मैं भी अखंडनीय पृथ्वी की गोद में सविता देव के समान यश से समृद्ध बनूं. (३८) अमुत्र सन्निह वेत्थेतः संस्तानि पश्यसि. इतः पश्यन्ति रोचनं दिवि सूर्य विपश्चितम्.. (३९) हे सूर्य! तुम परलोक में अथवा इस लोक में रहते हुए यहां की सभी बातों को जानते हो. तुम यहां और वहां के सब प्राणियों को देखते हो तथा सभी प्राणी इस लोक से आकाश में स्थित सूर्य को देखते हैं. (३९) देवो देवान् मर्चयस्यन्तश्चरस्यर्णवे. समानमग्निमिन्धते तं विदुः कवयः परे.. (४०) हे सूर्य! तुम देवता हो कर भी अन्य देवताओं को कर्म में प्रेरित करते हो तथा आकाश में घूमते हो. सूर्य अपने समान तेजस्वी अग्नि को प्रदीप्त करते हैं. ज्ञानी जन ऐसे सूर्य को जानते हैं. (४०) अवः परेण पर एनावरेण पदा वत्सं बिभ्रती गौरुदस्थात्. सा कद्रीची कं स्विदर्धं परागात् क्व स्वित् सूते नहि यूथे अस्मिन्.. (४१) एक पैर से बछड़े को तथा दूसरे से अन्न को धारण करती हुई श्वेत रंग की गौ उठती है. यह किसी अर्द्ध भाग में जाती और प्रसन्न रहती है. यह झुंड में जा कर नहीं रहती. (४१) एकपदी द्विपदी सा चतुष्पद्यष्टापदी नवपदी बभूवुषी. सहस्राक्षरा भुवनस्य पङ्क्तिस्तस्याः समुद्रा अधि वि क्षरन्ति.. (४२) यह वाणी रूपी गौ अर्थात् काव्यमयी भाषा एक, दो, चार, आठ अथवा नौ पादों वाले छंदों में विभाजित हुई हैं. इस प्रकार इस भाषा की मर्यादा हजार अक्षरों तक है. ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब भुवनों की पूर्ण करने वाली है तथा इस से काव्य के विविध रस टपकते हैं. (४२) ebook converter DEMO Watermarks*