अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
(३७) वसुजित, गोजित और साधनाजित नामक रोहित में आकाश और पृथ्वी स्थित हैं. मैं उन के सहस्र प्रादुर्भावों का वर्णन करता हुआ उन्हें लोक की महिमा का केंद्र मानता हूं. (३७) यशा यासि प्रदिशो दिशश्च यशाः पशूनामृत चर्षणीनाम्. यशाः पृथिव्या आदित्या उपस्थे ऽ हं भूयासं सवितेव चारुः.. (३८) हे सूर्य! तुम अपने यश के द्वारा दिशाओं और प्रदिशाओं में गमन करते हो. तुम अपने यश के द्वारा ही मनुष्यों और पशुओं में घूमते हो. मैं भी अखंडनीय पृथ्वी की गोद में सविता देव के समान यश से समृद्ध बनूं. (३८) अमुत्र सन्निह वेत्थेतः संस्तानि पश्यसि. इतः पश्यन्ति रोचनं दिवि सूर्य विपश्चितम्.. (३९) हे सूर्य! तुम परलोक में अथवा इस लोक में रहते हुए यहां की सभी बातों को जानते हो. तुम यहां और वहां के सब प्राणियों को देखते हो तथा सभी प्राणी इस लोक से आकाश में स्थित सूर्य को देखते हैं. (३९) देवो देवान् मर्चयस्यन्तश्चरस्यर्णवे. समानमग्निमिन्धते तं विदुः कवयः परे.. (४०) हे सूर्य! तुम देवता हो कर भी अन्य देवताओं को कर्म में प्रेरित करते हो तथा आकाश में घूमते हो. सूर्य अपने समान तेजस्वी अग्नि को प्रदीप्त करते हैं. ज्ञानी जन ऐसे सूर्य को जानते हैं. (४०) अवः परेण पर एनावरेण पदा वत्सं बिभ्रती गौरुदस्थात्. सा कद्रीची कं स्विदर्धं परागात् क्व स्वित् सूते नहि यूथे अस्मिन्.. (४१) एक पैर से बछड़े को तथा दूसरे से अन्न को धारण करती हुई श्वेत रंग की गौ उठती है. यह किसी अर्द्ध भाग में जाती और प्रसन्न रहती है. यह झुंड में जा कर नहीं रहती. (४१) एकपदी द्विपदी सा चतुष्पद्यष्टापदी नवपदी बभूवुषी. सहस्राक्षरा भुवनस्य पङ्क्तिस्तस्याः समुद्रा अधि वि क्षरन्ति.. (४२) यह वाणी रूपी गौ अर्थात् काव्यमयी भाषा एक, दो, चार, आठ अथवा नौ पादों वाले छंदों में विभाजित हुई हैं. इस प्रकार इस भाषा की मर्यादा हजार अक्षरों तक है. ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब भुवनों की पूर्ण करने वाली है तथा इस से काव्य के विविध रस टपकते हैं. (४२) ebook converter DEMO Watermarks*
आरोहन् द्यामृतः प्राव मे वचः. उत् त्वा यज्ञा ब्रह्मपूता वहन्त्यध्वगतो हरयस्त्वा वहन्ति.. (४३) हे सूर्य देव! तुम अमृत हो. सूर्यलोक में चढ़ते हुए तुम मेरे वचन की रक्षा करो. मंत्रमय यज्ञ और मार्गगामी अश्व तुम्हें वहन करते हैं. (४३) वेद तत् ते अमर्त्य यत् त आक्रमणं दिवि. यत् ते सधस्थं परमे व्योमन्.. (४४) हे अविनाशी सूर्य! द्युलोक में तुम्हारा स्थान है. तुम इस में गमन करते हो. मैं उस स्थान को जानता हूं. उपासकों सहित आकाश में तुम्हारा जो निवास स्थान है, उसे में भलीभांति जानता हूं. (४४) सूर्यो द्यां सूर्यः पृथिवीं सूर्य आपो ऽ ति पश्यति. सूर्यो भूतस्यैकं चक्षुरा रुरोह दिवं महीम्.. (४५) सूर्य देव आकाश, पृथ्वी और जल के साक्षी हैं. वे सभी प्राणियों की दर्शन शक्ति हैं. वे ही आकाश और पृथ्वी पर चढ़ते हैं. (४५) उर्वीरासन् परिधयो वेदिर्भूमिकल्पत. तत्रैतावग्नी आधत्त हिमं घ्रंसं च रोहितः.. (४६) भूमिरूपी वेदी पर यज्ञ का अनुष्ठान हुआ. इस यज्ञ की परिधियां विस्तृत थीं. वहीं पर शीतकाल और ग्रीष्म काल रूपी दो अग्नियों का आधान किया गया. (४६) हिमं घ्रंसं चाधाय यूपान् कृत्वा पर्वतान्. वर्षाज्यावग्नी ईजाते रोहितस्य स्वर्विदः.. (४७) सूर्यरूपी स्वर्ग को पाने की अभिलाषा वाले पुरुष हिम और ग्रीष्म रूपी दो अग्नियों का आधान कर के पर्वतों को यूप अर्थात् लकड़ी का खंभा बनाते हैं. वर्षा ऋतु रूपी घृत प्राप्त करने के लिए ये दोनों अग्नि तथा आज्य देव के हेतु यज्ञ करते हैं. (४७) स्वर्विदो रोहितस्य ब्रह्मणाग्निः समिध्यते. तस्माद् घ्रंसस्तस्माद्धिमस्तस्माद् यज्ञो ऽ जायत.. (४८) आत्मज्ञानी सूर्य संबंधी मंत्रों के द्वारा अग्नि को प्रदीप्त किया जाता है. उसी से हिम, दिवस और यज्ञ की उत्पत्ति हुई. (४८) ब्रह्मणाग्नी वावृधानौ ब्रह्मवृद्धौ ब्रह्माहुतौ. ब्रह्मोद्भावग्नी ईजाते राहितस्य स्वर्विदः.. (४९) ebook converter DEMO Watermarks*
जो पुरुष सूर्य रूपी स्वर्ग की कामना करते हैं, वे मंत्रों के साथ आहुति दी गई तथा मंत्रों के द्वारा प्रवृद्ध की गई अग्नियों का पूजन करते हैं, उन्हें सदा प्रदीप्त रखते हैं. (४९) सत्ये अन्यः समाहितो ऽ प्स्व १ न्यूः समिध्यते. ब्रह्मोद्भावग्नी ईजाते रोहितस्य स्वर्विदः.. (५०) सत्य में अन्य अग्नियां समाहित हैं. जल में प्रदीप्त होने वाली अग्नियां इस से भिन्न हैं. सूर्यरूपी स्वर्ग की प्राप्ति की इच्छा करने वाले पुरुषों ने उन अग्नियों का पूजन किया है. जो मंत्रों के द्वारा बढ़ी है. (५०) यं वातः परिशुम्भति यं वेन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः. ब्रह्मोद्भावग्नी ईजाते रोहितस्य स्वर्विदः.. (५१) वायु, इंद्र तथा ब्रह्मणस्पति जिस पुरुष को सुशोभित करना चाहते हैं, वे पुरुष ही सूर्यात्मक स्वर्ग की प्राप्ति की कामना करते हुए मंत्रों द्वारा बढ़ी हुई अग्नि की पूजा करते हैं. (५१) वेदिं भूमिं कल्पयित्वा दिवं कृत्वा दक्षिणाम्. घ्रंसं तदग्निं कृत्वा चकार विश्वमात्मन्वद् वर्षेणाज्येन रोहितः.. (५२) रोहित ने पृथ्वी को वेदी बना कर, आकाश को दक्षिणा का रूप दे कर और दिन को अग्नि स्वीकार कर के वर्षा रूपी घृत से जगत् को आत्मा के समान बना लिया है. (५२) वर्षमाज्यं घ्रंसो अग्निर्वेदिर्भूमिंरकल्पत. तत्रैतान् पर्वतानग्निर्गीर्भीरूर्ध्वाँ अकल्पयत्.. (५३) पृथ्वी को वेदी, दिन को अग्नि और वर्षा को घृत बनाया गया. स्तुतियों के द्वारा समृद्ध हुए अग्नि देव ने ही इन पर्वतों को उन्नत किया है. (५३) गीर्भिरूर्ध्वान् कल्पयित्वा रोहितो भूमिमब्रवीत्. त्वयीदं सर्वं जायतां यद् भूतं यच्च भाव्यम्.. (५४) रोहित ने पृथ्वी को स्तुतियों से उन्नत करते हुए उस से कहा कि भूत और भविष्य जो कुछ हों, वे तुम से ही उत्पन्न हों. (५४) स यज्ञः प्रथमो भूतो भव्यो अजायत. तस्माद्ध जज्ञ इदं सर्वं यत् किं चेदं विरोचते रोहितेन ऋषिणाभृतम्.. (५५) यज्ञ की उत्पत्ति पहले भूत और भविष्यत के रूप में ही हुई. जो कुछ भी रोचमान है, वह सब पृथ्वी से ही प्रकट हुआ था. रोहित ने उसे पुष्ट किया. (५५) ebook converter DEMO Watermarks*
यश्च गां पदा स्फुरति प्रत्यङ् सूर्यं च मेहति. तस्य वृश्चामि ते मूलं न च्छायां करवोऽपरम्.. (५६) जो सूर्य की ओर मुंह कर के मूत्र का त्याग करता है तथा गौ को अपने पैर से छूता है, मैं उस का मूल छिन्न करता हूं. मैं उस के ऊपर कभी छाया नहीं करता. (५६) यो माभिच्छायमत्येषि मां चाग्निं चान्तरा. तस्य वृश्चामि ते मूलं न च्छायां करवो ऽ परम्.. (५७) जो मनुष्य मेरे और अग्नि के मध्य से हो कर निकलता है अथवा जो मेरी छाया को लांघता है, मैं उस की जड़ काट दूंगा तथा उस के ऊपर कभी छाया नहीं करूंगा. (५७) यो अद्य देव सूर्य त्वां च मां चान्तरायति. दुष्वप्न्यं तस्मिंछमलं दुरितानि च मुज्महे.. (५८) हे सूर्य देव! हमारे और आप के मध्य जो बाधक होना चाहता है, उसे में पाप, दुःस्वप्न तथा दुष्कर्मों में स्थापित करता हूं. (५८) मा प्र गाम पथो वयं मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः. मान्त स्थुर्नो अरातयः.. (५९) हे इंद्र देव! जिस यज्ञ विधि में सोम का प्रयोग होता है, हम उस पद्धति से पृथक् न जाएं. हमारे देश में शत्रु न रहें. (५९) यो यज्ञस्य प्रसाधनस्तन्तुर्देवेष्वाततः. तमाहुतमशीमहि.. (६०) जो यज्ञ देवताओं में अधिक विस्तृत है, हम उस यज्ञ की वृद्धि करने वाले बनें. (६०) सूक्त-२ देवता—अध्यात्म रोहित उदस्य केतवो दिवि शुक्रा भ्राजन्त ईरते. आदित्यस्य नृचक्षसां महिव्रतस्य मीढुषः.. (१) महान कर्म करने वाले, सेचन करने वाले और समर्थ एवं साक्षी रूप सूर्य की निर्मल रश्मियां आकाश में चमकती हैं और सूर्य को ऊपर उठाती हैं. (१) दिशां प्रज्ञानां स्वरयन्तमर्चिषा सुपक्षमाशुं पतयन्तमर्णवे. स्तवाम सूर्यं भुवनस्य गोपां यो रश्मिभिर्दिश आभाति सर्वाः.. (२) हम ज्ञानमयी दिशाओं में अपने तेज से शब्द भरने वाले, सुंदर पंखों वाले, अपनी रश्मियों से प्रकाश देने वाले तथा लोकों के रक्षक सूर्य की स्तुति करते हैं. (२)
यत् प्राङ् प्रत्यङ् स्वधया यासि शीभं नानारूपे अहनी कृर्षि मायया. तदादित्य महि तत् ते महि श्रवो यदेको विश्वं परि भूम जायसे.. (३) हे सूर्य देव! तुम अन्नमय स्वधा अर्थात् हवियों के साथ पूर्व और पश्चिम दिशाओं को गमन करते हो. तुम अपने तेज से दिवस और रात्रि को भिन्नभिन्न रूपों वाला बनाते हो. हे सूर्य देव! यह तुम्हारी बहुत बड़ी महिमा है, जो तुम अकेले पूरे संसार को प्रभावित करते हो. (३) विपश्चितं तरणिं भ्राजमानं वहन्ति यं हरितः सप्त बह्वीः. सुताद् यमत्रिर्दिवमुन्निनाय तं त्वा पश्यन्ति परियान्तमाजिम्.. (४) सात तेजस्वी किरणें सूर्य के प्रकाश को प्रभावशाली बनाती हैं. ज्ञानीजन इस का महत्त्व जानते हैं. ये सूर्य द्युलोक पर चढ़ कर अपना तेज सर्वत्र फैलाते हैं. (४) मा त्वा दभन् परियान्तमाजिं स्वस्ति दुर्गाँ अति याहि शीभम्. दिवं च सूर्य पृथिवीं च देवीमहोरात्रे विमिमानो यदेषि.. (५) हे सूर्य देव! तुम आकाश और पृथ्वी पर दिन तथा रात्रि का निर्माण करते हुए विचरण करते हो. तुम दुर्गम स्थलों का शीघ्र और सुखपूर्वक उल्लंघन करो. चारों ओर घूमने वाले तुम को शत्रु वश में न कर सकें. (५) स्वस्ति ते सूर्य चरसे रथाय येनोभावन्तौ परियासि सद्यः. यं ते वहन्ति हरितो वहिष्ठाः शतमश्वा यदि वा सप्त बह्वीः.. (६) हे सूर्य देव! तुम्हारा रथ सब का कल्याण करने वाला है. उस रथ के द्वारा तुम उदय से अस्त तक विचरण करते हो. सात किरणों और अनंत प्रकाश तुम्हारे प्रभाव की वृद्धि कर रहे हैं. (६) सुखं सूर्य रथमंशुमन्तं स्योनं सुवह्निमधि तिष्ठ वाजिनम्. यं ते वहन्ति हरितो वहिष्ठाः शतमश्वा यदि वा सप्त बह्वीः.. (७) हे सूर्य देव! तुम अपने उस रथ पर बैठो जो अग्नि के समान ज्योति वाला तथा वेग से चलने वाला है. तुम ने प्रकाश करने वाले सौ अथवा अधिक सात घोड़ों को अपने रथ में जोड़ा है. (७) सप्त सूर्यो हरितो यातवे रथे हिरण्यत्वचसो बृहतीरयुक्त. अमोचि शुक्लो रजसः परस्ताद् विधूय देवस्तमो दिवमारुहत्.. (८) सूर्य अपनी माया के लिए अपने रथ में सुनहरी त्वचा वाले तथा हरे रंग के सात घोड़ों को जोड़ते हैं. वे अंधकार का विनाश करते हुए उन घोड़ों को छोड़ कर अपने लोक में चले जाते हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
उद् केतुना बृहता देव आगन्नापावृक् तमो ऽ भि ज्योतिरश्रैत्. दिव्यः सुपर्णः स वीरो व्यख्यददितेः पुत्रो भुवनानि विश्वा.. (९) सूर्य देव महान प्रकाश के साथ उदय को प्राप्त हुए हैं. उन्होंने अंधकार को दूर कर के तेज का आश्रय लिया है. अदिति के वीर पुत्र आदित्य अर्थात् सूर्य दिव्य प्रकाश वाले हैं. उन्होंने ही भुवनों को प्रकाशित किया है. (९) उद्यन् रश्मीना तनुषे विश्वा रूपाणि पुष्यसि. उभा समुद्रौ क्रतुना वि भासि सर्वॉल्लोकान् परिभूभ्राजमानः.. (१०) हे सूर्य देव! तुम उदय होने के बाद अपनी किरणों का विस्तार करते हो. तुम्हारे उदय होने पर सागर पर्यंत धरती पर यज्ञ कर्म आरंभ होते हैं. तुम गति करते हुए दोनों सागरों तथा समस्त लोकों को प्रकाशित करते हो. (१०) पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीडन्तौ परि यातो ऽ र्णवम्. विश्वान्यो भुवना विचष्टे हैरण्यैरन्यं हरितो वहन्ति.. (११) सूर्य और चंद्र दोनों बालकों के समान क्रीड़ा करते हुए अपनी शक्ति से ही आगेपीछे चलते हैं और भ्रमण करते हुए सागर तक पहुंच जाते हैं. इन दोनों में एक अर्थात् चंद्र सभी भुवनों को प्रकाशित करता है और दूसरा अर्थात सूर्य सभी ऋतुओं का निर्माण करता हुआ सभी को नवीनता प्रदान करता है. (११) दिवि त्वात्रिरधारयत् सूर्या मासाय कर्तवे. स एषि सुधृतस्तपन् विश्वा भूतावचाकशत्.. (१२) हे सूर्य देव! दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों से मुक्त होने वाले अत्रि ऋषि ने तुम्हें महीनों को बनाने के लिए आकाश में स्थापित किया है. तुम वहीं रहो और तपते हुए आकर सभी प्राणियों को प्रकाशित करते रहो. (१२) उभावन्तौ समर्धसि वत्सः संमातराविव. नन्वे ३ तदितः पुरा ब्रह्म देवा अमी विदुः.. (१३) बालक जिस प्रकार कुशलतापूर्वक अपने पिता और माता के पास सरलता से पहुंच जाता है, उसी प्रकार तुम दोनों सागरों के समीप पहुंच जाते हो. यह निश्चय है कि इस से पहले ही देवगण ब्रह्म को जानते हैं. (१३) यत् समुद्रमनु श्रितं तत् सिषासति सूर्यः. अध्वास्य विततो महान् पूर्वश्चापरश्च यः.. (१४) समुद्र में जो भी रत्न आदि हैं उन्हें सूर्य देव प्राप्त करते हैं. सूर्य का पूर्व से पश्चिम तक ebook converter DEMO Watermarks*
का मार्ग विशाल है. (१४) तं समाप्नोति जूतिभिस्ततो नापचिकित्सति. तेनामृतस्य भक्षं देवानां नाव रुन्धते.. (१५) हे सूर्य देव! तुम शीघ्र चलने वाले अश्वों की सहायता से उस मार्ग को शीघ्र प्राप्त कर लेते हो. तुम अपना मन इधरउधर नहीं होने देते, इस कारण तुम को अमृत अन्न का भाग नियमित रूप से प्राप्त होता है. (१५) उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्यम्.. (१६) सूर्य देव की किरणें विश्व को प्रभावित करने के लिए निकलती हैं. सभी को जानने वाले सूर्य के दर्शन सब जन कर सकें, इस हेतु उन की रश्मियां ऊपर उठती हैं. (१६) अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः. सूराय विश्वचक्षसे.. (१७) रात्रि की समाप्ति पर जिस प्रकार चोर भाग जाता है, उसी प्रकार सूर्य को देख कर रात्रि के साथसाथ सब तारे भाग जाते हैं. (१७) अदृश्रन्नस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु. भ्राजन्तो अग्नयो यथा.. (१८) सूर्य देव की किरणें अग्नि के समान चमकती हैं और सभी को प्रकाश देती हैं. (१८) तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य. विश्वमा भासि रोचन.. (१९) हे सूर्य देव! तुम नौका के समान सब के तारक, सब को देखने वाले, ज्योति प्रदान करने वाले तथा सब को प्रकाशमय करने वाले हो. (१९) प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषीः. प्रत्यङ् विश्वं स्व दृशे.. (२०) हे सूर्य देव! तुम सभी मानवी और दिव्य प्रजाओं के सामने प्रकट होते हो. तुम सभी को देखने के लिए प्रत्यक्ष रूप से उदय होते हो. (२०) येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु. त्वं वरुण पश्यसि.. (२१) हे पाप नाशक सूर्य! जिस दृष्टि से तुम सब का भरणपोषण करने वाले मनुष्य को देखते हो, उसी दृष्टि से हमें भी देखो. (२१) वि द्यामेषि रजस्पृथ्वहर्मीमानो अक्तुभिः. पश्यन् जन्मानि सूर्य.. (२२) हे सूर्य देव! तुम सभी जीवों को कृपा दृष्टि से देखते हुए तथा रात्रि और दिन का निर्माण करते हुए इन आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष में अनेक प्रकार से भ्रमण करते हो. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*
सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य. शोचिष्केशं विचक्षणम्.. (२३) हे सूर्य देव! तेजस्वी रश्मियों वाले रथ से जुड़े हुए हरे रंग के सात घोड़े तुम को वहन करते हैं. (२३) अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्यः. ताभिर्याति स्वयुक्तिभिः.. (२४) सूर्य सब को पवित्र करने वाले सात घोड़ों को अपने रथ में जोड़ते हैं तथा उन के सहारे अपनी युक्तियों से गमन करते हैं. (२४) रोहितो दिवमारुहत् तपसा तपस्वी. स योनिमैति स उ जायते पुनः स देवानामधिपतिर्बभूव.. (२५) सूर्य अपने तेज के सहारे स्वर्ग पर चढ़ते हैं. इस प्रकार उदय को प्राप्त होते हुए सूर्य अन्य सभी देवों के स्वामी हो गए हैं. (२५) यो विश्वचर्षशणिरुत विश्वतोमुखो यो विश्वतस्पाणिरुत विश्वतस्पृथः. सं बाहुभ्यां भरति सं पतत्रैर्द्यावापृथिवी जनयन् देव एकः.. (२६) अनेक सुखों वाले, सब को देखने वाले और सभी ओर किरणें फैलाने वाले सूर्य अपनी नीचे की ओर आती हुई किरणों के द्वारा आकाश और पृथ्वी को प्रकट करते हुए अपनी भुजाओं से सब का भरणपोषण करते हैं. (२६) एकपाद् द्विपदो भूयो वि चक्रमे द्विपात् त्रिपादमभ्येति पश्चात्. द्विपाद्व षट्पदो भूयो वि चक्रमे त एकपदस्तन्वं १ समासत.. (२७) सूर्य देव एक चरण वाले होने पर भी अनेक चरणों वालों से आगे बढ़ जाते हैं. अनेक चरणों वाले अनेक प्राणी इस एक चरण वाले सूर्य के आश्रय में रहते हैं. (२७) अतन्द्रो यास्यन् हरितो यदास्थाद् द्वे रूपे कृणुते रोचमानः. केतुमानुद्यन्सहमानो रजांसि विश्वा आदित्य प्रवतो वि भासि.. (२८) अज्ञान से रहित सूर्य चलते हुए जब विश्राम करते हैं, तब अपने दो रूप बनाते हैं. हे सूर्य देव! तुम उदय हो कर सभी लोकों को वश में करते हुए उन्हें प्रकाशित करते हो. (२८) बण्महाँ असि सूर्य बडादित्य महाँ असि. महांस्ते महतो महिमा त्वमादित्य महाँ असि.. (२९) हे सूर्य देव! यह सत्य है कि तुम महान हो और तुम्हारी महिमा भी महती है. (२९) रोचसे दिवि रोचसे अन्तरिक्षे पतङ्ग पृथिव्यां रोचसे रोचसे अपस्व १ न्तः.
उभा समुद्रौ रुच्या व्यापिथ देवो देवासि महिषः स्वर्जित्.. (३०) हे सूर्य देव! तुम स्वर्ग में, अंतरिक्ष में, पृथ्वी पर तथा जल में दमकते हो. तुम अपने तेज से पूर्व और पश्चिम सागरों को व्याप्त कर लेते हो. (३०) अर्वाङ् परस्तात् प्रयतो व्यध्व आशुर्विपश्चित् पतयन् पतङ्गः. विष्णुर्विचित्तः शवसाधितिष्ठन् प्र केतुना सहते विश्वमेजत्.. (३१) दक्षिण की ओर जाते हुए सूर्य अपना मार्ग शीघ्र ही पूरा कर लेते हैं. ये व्यापक देव परम ज्ञानी हैं. ये अपनी शक्ति से अधिष्ठित होते हैं. ये अपने ज्ञान के बल से समस्त विश्व को अपने वश में कर लेते हैं. (३१) चित्रश्चिकित्वान् महिषः सुपर्ण आरोचयन् रोदसी अन्तरिक्षम्. अहोरात्रे परि सूर्यं वसाने प्रास्य विश्वा तिरतो वीर्याणि.. (३२) महिमामय सूर्य ज्ञानवान एवं पूज्य हैं. सूर्य देव शोभन मार्ग से गमन करते हैं. सूर्य देव आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष को दमकाते हुए दिवस और रात्रि को आश्रय देते हैं. सूर्य देव के बल से ही सब पार होते हैं. (३२) तिग्मो विभ्राजन् तन्वं १ शिशानो ऽ रंगमासः प्रवतो रराणः. ज्योतिष्मान् पक्षी महिषो वयोधा विश्वा आस्थात् प्रदिशः कल्पमानः.. (३३) सूर्य देव अपनी किरणें दमकाते हुए अपने शरीर को तपाते हैं. ये सुंदर गति वाले, ज्योतिमान, महिमाशाली तथा अन्न को पुष्ट करने वाले हैं. (३३) चित्रं देवानां केतुरनीकं ज्योतिष्मान् प्रदिशः सूर्य उद्यन्. दिवाकरो ऽ ति द्युम्नैस्तमांसि विश्वातारीद् दुरितानि शुक्रः.. (३४) देवताओं की ध्वजा रूप सूर्य सब के दर्शनीय हैं. ये उदय हो कर दिशाओं को प्रकाशित करते हैं तथा सभी प्रकार के अंधकार को मिटाते हुए अपने प्रकाश से दिन को प्रकट करते हैं. सूर्य देव पापों को दूर करते हैं. (३४) चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः. आप्राद् द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च.. (३५) रश्मियों का प्रशंसनीय समूह मित्रावरुण के चक्षु के समान है. सूर्य देव भी प्राणियों के आत्मा रूप हैं. सभी प्राणियों में प्रवेश करने वाले सूर्य, आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्वी को व्याप्त किए हुए हैं. (३५) ebook converter DEMO Watermarks*
उच्चा पतन्तमरुणं सुपर्णं मध्ये दिवस्तरणिं भ्राजमानम्. पश्याम त्वा सवितारं यमाहुरजस्रं ज्योतिर्यदविन्ददत्रिः.. (३६) ऊर्ध्वगामी, अरुण वर्ण वाले एवं शुभ गति वाले सूर्य के हम सदा तभी दर्शन करें, जब वे आकाश में गमन कर रहे हों. (३६) दिवस्पृष्ठे धावमानं सुपर्णमदित्याः पुत्रं नाथकाम उप यामि भीतः. स नः सूर्य प्र तिर दीर्घमायुर्मा रिषाम सुमतौ ते स्याम.. (३७) मैं भयभीत हो कर आकाश में द्रुत गमन करते हुए सूर्य की स्तुति करता हुआ उन का आश्रय प्राप्त करता हूं. हे सूर्य! हम तुम्हारी शोभन कृपा दृष्टि में रहें तथा हिंसा को प्राप्त न हों. तुम हमें दीर्घ जीवन प्रदान करो. (३७) सहस्राह्ण्यं वियतावस्य पक्षौ हरेर्हंसस्य पततः स्वर्गम्. स देवान्त्सर्वानुरस्युपदद्य संपश्यन् याति भुवनानि विश्वा.. (३८) हम पापों के नाशक, सुंदर गमन वाले तथा स्वर्गगामी सूर्य देव के दोनों अर्थात् उत्तरायण व दक्षिणायन तथा सहस्रों दिनों तक नियम में रहते हैं. ये सूर्य देव सभी देवों को अपने में लीन कर के सभी भूतों अर्थात् प्राणियों को देखते हुए चलते हैं. (३८) रोहितः कालो अभवद् रोहितो ऽ ग्रे प्रजापतिः. रोहितो यज्ञानां मुखं रोहितः स्व १ राभरत्.. (३९) रोहित काल में ये प्रजापति थे. ये यज्ञों के मूल रूप हैं तथा ये ही रोहित अब स्वर्ग का पोषण करते हैं. (३९) रोहितो लोको अभवद् रोहितो ऽ त्यतपद् दिवम्. रोहितो रश्मिभिर्भूमिं समुद्रमनु सं चरत्.. (४०) स्वर्ग में रहने वाले रोहित अपनी रश्मियों से सागर और पृथ्वी में विचरते हैं. ऐसे रोहित दर्शन करने योग्य हैं. (४०) सर्वा दिशः समचरद् रोहितो ऽ धिपतिर्दिवः. दिवं समुद्रमाद् भूमिं सर्वं भूतं विरक्षति.. (४१) स्वर्ग के अधिपति रोहित सब दिशाओं में भ्रमण करते तथा स्वर्ग सागर में जाते हैं. ये सभी जीवों के साथसाथ पृथ्वी की रक्षा करते हैं. (४१) आरोहंछुक्रो बृहतीरतन्द्रो द्वे रूपे कृणुते रोचमानः. चित्रश्चिकित्वान् महिषो वातमाया यावतो लोकानभि यद् विभाति.. (४२) ebook converter DEMO Watermarks*
ये रोहित सूर्य रथ पर और अश्वों पर अपने दो रूप बनाते हैं. ये पूज्य महत्त्वशाली और प्रकाशमान हैं. सुंदर गमन वाले सूर्य सभी लोकों को प्रकाशित करते हैं. (४२) अभ्य १ न्येदेति पर्यन्यदस्यते ऽ होरात्राभ्यां महिषः कल्पमानः. सूर्य वयं रजसि क्षियन्तं गातुविदं हवामहे नाथमानाः.. (४३) दिनों तथा रात्रियों के द्वारा सूर्य का एक रूप सामने आता है. उन का दूसरा रूप गमनशील है. स्वर्ग के मार्ग में चलने वाले एवं अंतरिक्षगामी सूर्य का हम आह्वान करते हैं. (४३) पृथिवीप्रो महिषो नाथमानस्य गातुरदब्धचक्षुः परि विश्वं बभूव. विश्वं संपश्यन्त्सुविद्रत्रो यजत्र इदं शृणोतु यदहं ब्रवीमि.. (४४) जिन की दृष्टि कभी हीन नहीं होती जो पृथ्वी के पालनकर्ता और महिमाशाली हैं, वे सूर्य संसार के सभी ओर व्याप्त हैं. वे जगत् के द्रष्टा, अत्यधिक ज्ञानी और पूज्य हैं. ऐसे सूर्य मेरे वचन सुनें. (४४) पर्यस्य महिमा पृथिवीं समुद्रं ज्योतिषा विभ्राजन् परि द्यामन्तरिक्षम्. सर्वं संपश्यन्त्सुविद्रत्रो यजत्र इदं शृणोतु यदहं ब्रवीमि.. (४५) सूर्य अपनी ज्योति के द्वारा व्याप्त हो कर पृथ्वी, सागर और अंतरिक्ष में अपनी ज्योति के द्वारा व्याप्त हैं. सब के कर्मों को देखने वाले सूर्य की महिमा अंतरिक्ष में फैली हुई है. सूर्य शोभना विद्या वाले तथा पूज्य हैं. (४५) अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषासम्. यह्वा इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सिस्रते नाकमच्छ.. (४६) गौ के समान आने वाली उषा के अग्नि देव मनुष्य की सुविधाओं के द्वारा जाने जाते हैं. उन की ऊर्ध्वगामी रश्मियां स्वर्ग की ओर शीघ्र जाती हैं. मैं सूर्य का आश्रय प्राप्त करता हूं. (४६) सूक्त-३ देवता—अध्यात्म रोहित य इमे द्यावापृथिवी जजान यो द्रापिं कृत्वा भुवनानि वस्ते. यस्मिन् क्षियन्ति प्रदिशः षडुर्वीर्याः पतङ्गो अनु विचाकशीति. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१) इस आकाश और पृथ्वी को उन्होंने प्रकट किया जो सभी लोकों को आच्छादित करते हैं, जिन में छह उर्वियां और दिशाएं निवास करती हैं. जिन दिशाओं को वे ही प्रकाशित करते ebook converter DEMO Watermarks*
हैं, उन क्रोधपूर्ण सूर्य का जो अपमान करता है अथवा विद्वान् ब्राह्मण की हिंसा करता है अथवा कष्ट देता है, हे रोहित देव! तुम उस को कंपित करो तथा उसे क्षीण करते हुए बंधन में डाल दो. (१) यस्माद् वाता ऋतुथा पवन्ते यस्मात् समुद्रा अधि विक्षरन्ति. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२) जिस देवता के प्रभाव से वायु ऋतुओं के अनुसार चलती है तथा समुद्र प्रभावित होते हैं, क्रोध में भरे हुए सूर्य का जो अपमान करता है अथवा विद्वान् ब्राह्मण की हिंसा करता है, हे रोहित देव! उस ब्रह्मघाती को कंपित करते हुए क्षीण करो और बंधन में डाल दो. (२) यो मारयति प्राणयति यस्मात् प्राणन्ति भुवनानि विश्वा. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (३) जो मनुष्य में प्राण भरते हैं, जो मनुष्य की हिंसा करते हैं, उन के द्वारा सभी प्राणी श्वास लेते और प्रश्वास के रूप में छोड़ते हैं, क्रोध में भरे उस देवता का जो अपमान करता है अथवा विद्वान् ब्राह्मण की हिंसा करता है, उस ब्रह्मघाती को कंपित करते हुए हे रोहित देव! क्षीण करो एवं बंधन में डालो. (३) यः प्राणेन द्यावापृथिवी तर्पयत्यपानेन समुद्रस्य जठरं यः पिपर्ति. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (४) जो देवता प्राण, आकाश और पृथ्वी को तृप्त करता है तथा अपमान से समुद्र के पेट को पालता है, क्रोध में भरे उस के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव कंपित करते हुए क्षीण बनाओ एवं बंधन में डालो. (४) यस्मिन् विराट् परमेष्ठी प्रजापतिरग्निर्वैश्वानरः सह पङ्क्त्या श्रितः. यः परस्य प्राणं परमस्य तेज आददे. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (५) जिस में विराट् परमेष्ठी वैश्वानर पंक्ति, प्रजा और अग्नि सहित निवास करते हैं, जिस ने उत्कृष्ट प्राण के महान तेज को धारण किया है, उन क्रोधवंत देवता के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण करो तथा अपने बंधन में बांध लो. (५) eBook converter DEMO Watermarks*
यस्मिन् षडुर्वीः पञ्च दिशो अधि श्रिताश्चतस्र आपो यज्ञस्य त्रयो ऽ क्षराः. यो अन्तरा रोदसी क्रुद्धश्चक्षुषैक्षत. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (६) पांच दिशाएं, छह उर्वियां, चार जलों तथा यज्ञ के तीन अक्षर जिस में आश्रित हैं, जो आकाश और पृथ्वी के मध्य अपने क्रोधपूर्ण नेत्र से देखता है, उस क्रोधवान देवता के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाश में बांध लो. (६) यो अन्नादो अन्नपतिर्बभूव ब्रह्मणस्पतिरुत यः. भूतो भविष्यद् भुवनस्य यस्पतिः. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (७) जो ब्रह्मणस्पति हैं, जो अन्न के पालक और भक्षक हैं, जो भूत, भविष्य और लोक के स्वामी हैं, उन क्रोधयुक्त देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों में बांध लो. (७) अहोरात्रैर्विमितं त्रिंशदङ्गं त्रयोदशं मासं योनिर्मिमीति. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (८) जिन्होंने तीन दिनरात्रि का समूह बना कर तेरहवें अधिक मास का निर्माण किया, ऐसे क्रोधयुक्त देव के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों में बांध लो. (८) कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत् पतन्ति. त आववृत्रन्त्सद्नादृतस्य. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (९) सूर्य की सुंदर रश्मियां जल को सोख कर स्वर्ग में जाती हैं तथा दक्षिणायन में जल स्थान से लौटती हैं, उन क्रोध वाले देव के अपराधी एवं विद्वान् ब्राह्मणों के हिंसक को हे रोहितदेव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों में बांध लो. (९) यत् ते चन्द्रं कश्यप रोचनावद् यत् संहितं पुष्कलं चित्रभानु. यस्मिन्त्सूर्या आर्पिताः सप्त साकम्. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. ebook converter DEMO Watermarks*
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१०) हे कश्यप! तुम्हारे रोचमान चित्रभानु में सात सूर्य एक साथ रहते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों में बांध लो. (१०) बृहदेनमनु वस्ते पुरस्ताद् रथन्तरं प्रति गृह्णाति पश्चात्. ज्योतिर्वसाने सदमप्रमादम्. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (११) जिस के अनुकूल रह कर बृहत् आच्छादन करता और रथंतर उसे धारण करता है, वे दोनों ही जातियों से सदैव ढके रहते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी एवं विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ अपने पाशों से बांध दो. (११) बृहदन्यतः पक्ष आसीद् रथन्तरमन्यतः सबले सध्रीची. यद् रोहितमजनयन्त देवाः. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१२) देवताओं द्वारा रोहित को उत्पन्न करने के समय बृहत् एक ओर तथा रथंतर दूसरी ओर हुए. ये दोनों ही शक्तिशाली और साथ रहने वाले पक्ष हैं. इस क्रोधवंत देव के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने बंधन में बांध लो. (१२) स वरुणः सायमग्निर्भवति स मित्रो भवति प्रातरुद्यन्. स सविता भूत्वान्तरिक्षेण याति स इन्द्रो भूत्वा तपति मध्यतो दिवम्. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१३) वे वरुण देव सायं समय अग्नि होते हैं और प्रातःकाल उदित होते हुए मित्र बन जाते हैं. वे सविता के रूप से अंतरिक्ष में तथा इंद्र के रूप में स्वर्ग में स्थित रहते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव का जो अपराध करता है और विद्वान् ब्राह्मण की हिंसा करता है, उसे हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों में बांध लो. (१३) सहस्राह्ण्यं वियतावस्य पक्षौ हरेर्हंसस्य पततः स्वर्गम्. स देवान्त्सर्वानुरस्युपदद्य संपश्यन् याति भुवनानि विश्वा. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*
इन पापनाशक और स्वर्गगामी सूर्य से दोनों अयन अर्थात् उत्तरायण और दक्षिणायन सहस्रों दिवसों में नियमपूर्वक बंधे रहते हैं. ये सब देवताओं को अपने में लीन कर के सभी जीवों को देखते हुए चलते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों के बंधन में डालो. (१४) अयं स देवो अप्स्व १ न्तः सहस्रमूलः पुरुशाको अत्रिः. य इदं विश्वं भुवनं जजान. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१५) सभी लोकों को जिन्होंने प्रकाशित किया वे देव जल में वास करते हैं. वे ही सहस्रों के मूल रूप तथा तीनों तापों अर्थात् दैहिक, दैविक भौतिक से रहित अग्नि हैं. इस क्रोधवंत देव के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों में बांध लो. (१५) शुक्रं वहन्ति हरयो रघुष्यदो देवं दिवि वर्चसा भ्राजमानम्. यस्योर्ध्वा दिवं तन्व १ स्तपन्त्यर्वाङ् सुवर्णैः पटरैर्वि भाति. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१६) स्वर्ग में अपने तेज से चमकते हुए सूर्य को उन की द्रुतगामी रश्मियां निर्मल रस प्राप्त कराती हैं उन की देह के ऊर्ध्व भाग रूप रश्मियां स्वर्ग को संतप्त करती हैं. जो स्वर्णिम रश्मियों द्वारा प्रकाश फैलाते हैं, उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों से बांध दो. (१६) येनादित्यान् हरितः संवहन्ति येन यज्ञेन बहवो यन्ति प्रजानन्तः. यदेकं ज्योतिर्बहुधा विभाति. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१७) जिन के प्रभाव से सूर्य के अश्व सूर्य को वहन करते हैं तथा जिन के प्रभाव से विज्ञ पुरुष यज्ञ आदि कर्मों को प्राप्त होते हैं, जो एक ज्योति होते हुए भी अनेक रूप से प्रकाशमान हैं, ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांधो. (१७) सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा. त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वा भुवनाधि तस्थुः. ebook converter DEMO Watermarks*
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१८) फैलने वाली किरणें अन्य जातियों को निस्तेज कर के चक्र वाले सूर्य के रथ में युक्त होती हैं. ये सूर्य सप्तऋषियों द्वारा किए हुए नमस्कार को स्वीकार कर के घूमते हैं. ये ग्रीष्म, वर्षा और हेमंत—इन तीन ऋतुओं वाले वर्ष को बनाते हैं. सब लोक इस काल के आश्रित हैं. ऐसे क्रोधवंत देवता के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और उसे अपने पाशों से बांध लो. (१८) अष्टधा युक्तो वहति वह्निरुग्रः पिता देवानां जनिता मतीनाम्. ऋतस्य तन्तुं मनसा मिमानः सर्वा दिशः पवते मातरिश्वा. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१९) आठ प्रकार से बहने वाले अग्नि उग्र हैं. वे देवों के पालक तथा बुद्धियों को उत्पन्न करने वाले हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांध दो. (१९) सम्यञ्चं तन्तुं प्रदिशो ऽ नु सर्वा अन्तर्गायत्र्याममृतस्य गर्भे. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२०) गायत्री में, अमृत के गर्भ में तथा सभी दिशाओं में पूजनीय जलतंतु को वायु पवित्र करते हैं. उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांध दो. (२०) निमुचस्तिस्रो व्युषो ह तिस्रस्त्रीणि रजांसि दिवो अङ्ग तिस्रः. विद्मा ते अग्ने त्रेधा जनित्रं त्रेधा देवानां जनिमानि विद्म. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२१) हे अग्नि! हम तुम्हारी तीनों उत्पत्तियों को जानते हैं. तुम्हारी तीनों गतियां भस्म करने वाली हैं. हम तीन लोकों तथा स्वर्ग में तीन भेदों को भी जानते हैं. ऐसे उन क्रोधवंत देव के अपराधी को तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहितदेव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांध लो. (२१) वि य और्णोत् पृथिवीं जायमान आ समुद्रमदधादन्तरिक्षे. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*
जो उत्पन्न हो कर भूमि को आच्छादित करता है तथा जल को अंतरिक्ष में स्थिर करता है, ऐसे उस क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों से बांध लो. (२२) त्वमग्ने ऋतुभिः केतुभिर्हितो ३ र्कः समिद्ध उदरोचथा दिवि. किमभ्यार्चन्मरुतः पृश्निमातरो यद् रोहितमजनयन्त देवाः. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२३) हे अग्नि! तुम ऋतु संबंधी दशों में प्रदीप्त किए जाते हो तथा स्वर्ग में अर्चना के साधन रूप बनते हो. क्या पश्चिमाताओं के पुत्र मरुद्गण ने तुम्हारी पूजा की थी जो देवता रोहित देव से मिले थे. उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों से बांध लो. (२३) य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः. यो ३ स्येशे द्विपदो यश्चतुष्पदः. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२४) शारीरिक बल के प्रदाता आत्मिक बल के प्रेरक, जिन के बल की देवता आराधना करते हैं तथा जो प्राणिमात्र के स्वामी हैं, ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों से बांध लो. (२४) एकपाद् द्विपदो भूयो वि चक्रमे द्विपात् त्रिपादमभ्येति पश्चात्. चतुष्पाच्चक्रे द्विपदामभिश्वरे संपश्यन् पङ्क्तिमुपतिष्ठ मानः. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२५) यह देव एक पैर वाला होने पर भी दो पैर वालों से तेज दौड़ता है, दो पैरों वाला तीन पैरों वालों के पीछे चलता है. चार पैरों वाला दो पैरों वालों तथा एक स्वर में रहने वालों की पंक्ति में देखता हुआ उन से सेवा लेता है. ऐसे उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक ब्रह्मघाती को हे रोहितदेव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और उसे अपने दृढ़ पाशों से बांध लो. (२५) कृष्णायाः पुत्रो अर्जुनो रात्र्या वत्सो ऽ जायत. स ह द्यामध रोहति रुहो रुरोह रोहितः.. (२६) काले रंग की रात्रि का पुत्र प्रकाशमान सूर्य हुआ है. लाल रंग वाला वह वृद्धि करने वाले ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-४ देवता—अध्यात्म
सब से ऊपर चढ़ा है. वही निश्चित रूप से द्युलोक पर चढ़ता है. (२६) सूक्त-४ देवता—अध्यात्म स एति सविता स्वर्दिवस्पृष्ठे ऽ वचाकशतू.. (१) वे सूर्य आकाश की पीठ पर चमकते हुए आते हैं. (१) रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (२) सूर्य ने अपनी रश्मियों से आकाश को ढक दिया है. सूर्य रश्मियों से युक्त हैं. (२) स धाता स विधर्ता स वायुर्नभ उच्छ्रितम्. रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (३) वह धाता है, विधाता है तथा वही वायु है, जिस ने आकाश को ऊंचा बनाया है. (३) सो ऽ र्यमा स वरुणः स रुद्रः स महादेवः. रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (४) वही अर्यमा, वही वरुण, वही रुद्र और वही महादेव है. (४) सो अग्निः स उ सूर्यः स उ एव महायमः. रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (५) वही अग्नि, वे ही सूर्य तथा वे ही महान यम हैं. (५) तं वत्सा उप तिष्ठन्त्येकशीर्षाणो युता दश. रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (६) एक शीश वाले दस वत्स उन्हीं की आराधना करते हैं. (६) पश्चात् प्राञ्च आ तन्वन्ति यदुदेति वि भासति. रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (७) वे उदय होते ही चमकने लगते हैं तथा उन के पीछे उन की पूजनीय रश्मियां उन के चारों ओर छा जाती हैं. (७) तस्यैष मारुतो गणः स एति शिक्याकृतः.. (८) छींके के आकार वाला उन का ही एक गण मारुत उनके पीछे आ रहा है. (८) eBook converter DEMO Watermarks*
रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (९) उन्होंने अपनी रश्मियों से आकाश को ढक लिया है. ये महान इंद्र के द्वारा किरणों से ढके हुए चले आ रहे हैं. (९) तस्येमे नव कोशा विष्टम्भा नवधा हिताः.. (१०) उस के नौ कोष विविध रूप धारण किए हुए हैं. (१०) स प्रजाभ्यो वि पश्यति यच्च प्राणति यच्च न.. (११) वे स्थावर और जंगम सभी प्रजाओं के द्रष्टा और सभी के साक्षी हैं. (११) तमिदं निगतं सहः स एष एक एकवृदेक एव.. (१२) यह सब उसी को प्राप्त होता है. वह अकेला ही एकवृत है. (१२) एते अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति.. (१३) सब देवता इस एक का ही वरण करते हैं. (१३) सूक्त-५ देवता—अध्यात्म कीर्तिश्च यशश्चाम्भश्च नभश्च बाह्मणवर्चसं चान्नं चान्नाद्यं च य एतं देवमेकवृतं वेद.. (१) कीर्ति, यश, आकाश, जल, ब्रह्मवर्चस् अर्थात् ब्रह्म तेज अन्न और अन्न को पचाने की क्रिया उसे ही प्राप्त होती है, जो इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता है. (१) न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (२) इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता द्वितीय, तृतीय चतुर्थ नहीं कहलाता. (२) न पञ्चमो न षष्ठः सप्तमो नाप्युच्यते. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (३) इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता पंचम, षष्ठ अथवा सप्तम नहीं कहलाता है. (३) नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (४) जो इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता है वह अष्टम, नवम नहीं कहलाता है. (४) स सर्वस्मै वि पश्यति यच्च प्राणति यच्च न. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (५)
इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता स्थावर और जंगम सभी को देखने वाला होता है. (५) तमिदं निगतं सहः स एष एक एकवृदेक एव. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (६) वह असाधारण एकवृत अर्थात् ब्रह्म ही है, यह सब उसे ही प्राप्त होता है. (६) सर्वे अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति. य एतं देवमेकवृतं वेद... (७) ये सब देव उस ब्रह्म में एक रूप होते हैं, जो एक व्रत को जानता है. (७) सूक्त-६ देवता—अध्यात्म ब्रह्म च तपश्च कीर्तिश्च यशश्चाम्भश्च नभश्च ब्राह्मणवर्चसं चान्नं चान्नाद्यं च. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (१) भूतं च भव्यं च श्रद्धा च रुचिश्च स्वर्गश्च स्वधा च.. (२) य एतं देवमेकवृतं वेद.. (३) ब्रह्म, तप, कीर्ति, यश, जल, आकाश, ब्रह्मचर्य, अन्न और अन्न को पचाने की शक्ति व भूत, भविष्य, श्रद्धा, रुचि, स्वर्ग और स्वधा—ये सभी उस एक वृत अर्थात् ब्रह्म के ज्ञाता को प्राप्त होते हैं. (१-३) य एव मृत्युः सो ३ मृतं सो ३ भ्वं १ स रक्षः. (४) वे ही मृत्यु, अमृत, अभ्व हैं तथा वही राक्षस हैं. (४) स रुद्रो वसुवनिर्वसुदेये नमोवाके वषट्कारो ऽ नु संहितः.. (५) वही रुद्र धनदान के समय धन प्राप्त करने वाले तथा वही नमस्कार यज्ञ में उत्तम रीति से बोला गया वष्टकार है. (५) तस्येमे सर्वे यातव उप प्रशिषमासते.. (६) ये सब राक्षस आदि उस की आज्ञा में रहते हैं. (६) तस्यामू सर्वा नक्षत्रा वशे चन्द्रमसा सह.. (७) ये सब नक्षत्र चंद्रमा के साथ उस के वश में रहते हैं. (७) सूक्त-७ देवता—अध्यात्म ebook converter DEMO Watermarks*