अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 714, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौभाग्यशालिनी बने. (१८) प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद् येन त्वाबध्नात् सविता सुशेवाः. ऋतस्य योनौ सुकृतस्य लोके स्योनं ते अस्तु सहसंभलायै.. (१९) मैं तुझे वरुण के उस शाप से मुक्त करता हूं, जिस से तुझे सेवा करने योग्य सविता ने बांधा था. सदाचारी और उत्तम कर्म करने वाले पति के घर में तुझे सुख प्राप्त हो. (१९) भगस्त्वेतो नयतु हस्तगृह्याश्विना त्वा प्र वहतां रथेन. गृहान् गच्छ गृहपत्नी यथासो वशिनी त्वं विदथमा वदासि.. (२०) भग नाम के देव तेरा हाथ पकड़ कर तुझे यहां से चलाएं. अश्विनीकुमार तुझे रथ में बैठा कर तेरे पति के घर पहुंचाएं. तू अपने पति के घर को जा. वहां तू घर की स्वामिनी बन और सब को वश में रख. पति के घर में तू उत्तम विवेक की बात कह. (२०) इह प्रियं प्रजायै ते समृध्यतामस्मिन् गृहे गार्हपत्याय जागृहि. एना पत्या तन्वं १ सं स्पृशस्वाथ जिर्विर्विदथमा वदासि.. (२१) अपने पति के घर में तू गार्हपत्य अग्नि के प्रति सचेत रह. तेरी संतान के लिए वस्तुएं बढ़ें. तू अपनी आयु पूर्ण होने तक बोलती रहे. (२१) इहैव स्तं मा वि यौष्टं विश्वमायुर्व्य श्रुतम्. क्रीडन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानौ स्वस्तकौ.. (२२) तुम दोनों पतिपत्नी सदा साथ रहो. तुम कभी एकदूसरे से अलग मत होओ. तुम दोनों जीवन पर्यंत अनेक प्रकार के भोजन करो, अपने पुत्र आदि के साथ क्रीड़ा कर के तथा कल्याण से मुक्त होते हुए सदा प्रसन्न रहो. (२२) पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीडन्तौ परि यातो ऽ र्णवम्. विश्वान्यो भुवना विचष्ट ऋतूंरन्यो विदधज्जायसे नवः.. (२३) ये सूर्य और चंद्रमा शिशु के समान क्रीड़ा करते हुए पूर्व से पश्चिम की ओर गमन करते हैं. इन में से एक अर्थात् सूर्य लोकों को देखता हुआ ऋतुओं का निर्माण करता है तथा नवीन रूप में प्रकट होता है. (२३) नवोनवो भवसि जायमानो ऽ ह्नां केतुरुषसामेष्यग्रम्. भागं देवेभ्यो वि दधास्यायन् प्र चन्द्रमस्तिरसे दीर्घमायुः.. (२४) हे चंद्र! तुम मास में स्थित हो कर सदा नवीन रहते हो. तुम अपनी कलाओं को घटाते और बढ़ाते हुए प्रतिपदा आदि तिथियों का निर्माण करते हो. तुम उषा काल में आगे आ कर ebook converter DEMO Watermarks*