भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 742, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 742

देवताओं ने पूर्व दिशा के कोने से उस की रक्षा के लिए धनुष धारण करने वाले भव अर्थात् महादेव को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (१) भव एनमिष्वासः प्राच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति. नैनं शर्वो न भवो नेशानः.. (२) जो इस बात को जानता है, धनुष धारण करने वाले भव अर्थात् महादेव, शर्व, ईशान उस के अनुकूल रहते हैं. (२) नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (३) जो इसे जानता है, उस के अनुकूल रहने वाले पुरुषों और पशुओं की वे हिंसा नहीं करते. (३) तस्मै दक्षिणाया दिशो अन्तर्देशाच्छर्वमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (४) देवताओं ने दक्षिण दिशा की ओर से बाण चलाने वाले शर्व अर्थात् शिव को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (४) शर्व एनमिष्वासो दक्षिणाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति. नैनं शर्वो न भवो नेशानः नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (५) जो इस बात को जानता है, दक्षिण दिशा के कोण से शर्व, भव और ईशान उस के अनुकूल रहते हैं. जो पुरुष और पशु उस के अनुकूल होते हैं. शर्व उन की हिंसा नहीं करते. (५) तस्मै प्रतीच्या दिशो अन्तर्देशात् पशुपतिमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (६) देवताओं ने पश्चिम दिशा के कोने से बाण फेंकने वाले पशुपति को उस का अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (६) पशुपतिरेनमिष्वासः प्रतीच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति. नैनं शर्वो न भवो नेशानः. नास्य पशून् समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (७) जो इस बात को जानता है, पशुपति पश्चिम दिशा के कोने से उस के अनुकूल रहते हैं. जो पुरुष और पशु उस के अनुकूल होते हैं, पशुपति उन की हिंसा नहीं करते हैं. (७) तस्मा उदीच्या दिशो अन्तर्देशादुग्रं देवमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (८)

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