अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 744, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवताओं ने उस की सभी दिशाओं के कोनों से रक्षा करने के लिए धनुष धारण करने वाले ईशान को अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (१४) ईशान एनमिष्वासः सर्वेभ्यो अन्तर्देशेभ्यो ऽ नुष्ठातानु तिष्ठति नैनं शर्वो न भवो नेशानः.. (१५) नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (१६) जो इस बात को जानता है, ईशान उस की सभी दिशाओं के कोनों से रक्षा करते हैं. जो पुरुष एवं पशु उस के अनुकूल होते हैं, ईशान भव और शर्व उन की हिंसा नहीं करते. (१५-१६) सूक्त-६ देवता—अध्यात्म, व्रात्य स ध्रुवां दिशमनु व्यचलत्.. (१) वह व्रात्य ध्रुव दिशा की ओर चल पड़ा. (१) तं भूमिश्चाग्निश्चौषधयश्च वनस्पतयश्च वानस्पत्याश्च वीरुधश्चानुव्य चलन्.. (२) पृथ्वी, अग्नि, ओषधि, वनस्पति तथा ओषधियां उस के पीछे चले. (२) भूमेरश्च वै सो ३ ग्नेश्चौषधीनां च वनस्पतीनां च वानस्पत्यानां च वीरुधां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (३) जो इस बात को जानता है, वह पृथ्वी, अग्नि, ओषधि एवं वनस्पतियों का प्रिय होता है. (३) स ऊर्ध्वां दिशमनु व्यचलत्.. (४) वह ऊपर की दिशा की ओर चला. (४) तमृतं च सत्यं च सूर्यश्च चन्द्रश्च नक्षत्राणि चानुव्यचलन्.. (५) ऋतु, सत्य, सूर्य, चंद्र और नक्षत्र उस के पीछे चले. (५) ऋतस्य च वै स सत्यस्य च सूर्यस्य च चन्द्रस्य च नक्षत्राणां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (६) जो इस बात को जानता है वह सूर्य, चंद्रमा तथा नक्षत्र का प्रिय स्थान होता है. (६) ebook converter DEMO Watermarks*