भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 760, कुल 1063 में से

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सोलहवां कांड

सूक्त-१ देवता—प्रजापति अतिसृष्टो अपां वृषभो ऽ तिसृष्टा अग्नयो दिव्याः.. (१) जलों में जो वृषभ के समान जल है वह मुक्त हुआ है और दिव्य अग्नियां मुक्त हुई हैं. (१) रुजन् परिरुजन् मृणन् प्रमृणन्.. (२) म्रोको मनोहा खनो निर्दाह आत्मदूषिस्तनूदूषिः.. (३) इदं तमति सृजामि तं माभ्यवनिक्षि.. (४) तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.. (५) भंग करने वाला, विनाशक, पलायन करने वाला, मन को दबाने वाला, दाह उत्पन्न करने वाला, खोदने से प्राप्त होने वाला और देह को दूषित करने वाला जो जल है, उस से अपने शत्रुओं को युक्त करता हुआ मैं उस का त्याग करता हूं. मैं स्वयं उस का स्पर्श नहीं करूंगा. (२-५) अपामग्रमसि समुद्रं वो ऽ भ्यवसृजामि.. (६) हे जलों के श्रेष्ठ भाग! मैं तुम्हें सागर की ओर प्रेरित करता हूं. (६) यो ३ प्स्व १ग्निरति तं सृजामि म्रोकं खनिं तनूदूषिम्.. (७) शरीर के बल का अपहरण कर के जलों के भीतर ले जाने वाले अग्नि का भी मैं त्याग करता हूं. (७) यो व आपो ऽ ग्निराविवेश स एष यद् वो घोरं तदेतत्.. (८) हे जल! जो अग्नि तुम में प्रविष्ट हुई है वह तुम्हारा भयानक भाग है. (८) इन्द्रस्य व इन्द्रियेणाभि षिञ्चेत्.. (९) हे जल! जो तुम्हारा अत्यधिक ऐश्वर्य वाला भाग है, उसे हम इंद्रियों से सींचें. (९) अरिप्रा आपो अप रिप्रमस्मत्.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

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