अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 787, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंयमी—हे यम! संतान उत्पन्न करने वाले देव ने हम दोनों को माता के उदर में ही दांपत्य बंधन में बांध दिया है. उस देव के कर्म का जो फल है, उसे कौन निष्फल कर सकता है. त्वष्टा देव के गर्भ में ही हमारे दंपती बनाने वाले कर्म को आकाश और पृथ्वी दोनों जानते हैं. इस कारण यह असत्य नहीं है. (५) को अद्य युङ्क्ते धुरि गा ऋतस्य शिमीवतो भामिनो दुर्हणायून्. आसन्निषून् हृत्स्वसो मयोभून् य एषां भृत्यामृणधत् स जीवात्.. (६) यम—हे यमी! सत्य का भार वहन करने के निमित्त अपनी वाणी रूप वृषभ को कौन नियुक्त कर सकता है. कर्मठ, तेजस्वी, क्रोध और लज्जा से हीन तथा अपने शब्दों से श्रोताओं के हृदय में बैठने वाला जो पुरुष सत्य वचनों से ही वृद्धि करता है, वह उस के फल के कारण दीर्घजीवी होता है. (६) को अस्य वेद प्रथमस्याह्नः क ईं ददर्श क इह प्र वोचत्. बृहन्मित्रस्य वरुणस्य धाम कदु ब्रव आहनो वीच्या नॄन्.. (७) यमी—हे यम! हमारे प्रथम दिन को कौन जान रहा है और कौन देख रहा है? फिर कौन पुरुष इस बात को दूसरों से कह सकेगा? दिन मित्र देवता का स्थान है. ये दोनों ही विशाल हैं. इसलिए मेरी इच्छा के प्रतिकूल मुझे क्लेश देने वाले तुम अनेक कर्मों वाले मनुष्यों के संबंध में ऐसा किस प्रकार कहते हो. (७) यमस्य मा यम्यं १ काम आगन्त्समाने योनौ सहशेय्याय. जायेव पत्ये तन्वं रिरिच्यां वि चिद् वृहेव रथ्येव चक्रा.. (८) मेरी इच्छा है कि पति को अपना शरीर अर्पण करने वाली पत्नी के समान यम को अपनी देह अर्पित करूं. वे दोनों पहिए के समान मार्ग में एकदूसरे से मिलते हैं. मैं उसी प्रकार की हो जाऊं. (८) न तिष्ठन्ति न नि मिषन्त्येते देवानां स्पश इह ये चरन्ति. अन्येन मदाहनो याहि तूयं तेन वि वृह रथ्येव चक्रा.. (९) यम—हे यमी! देवदूत लगातार विचरण करते रहते हैं. इसलिए हे मेरी धर्म बुद्धि को नष्ट करने की इच्छा करने वाली! तू मुझे छोड़ कर किसी अन्य को अपना पति बना तथा शीघ्र जा कर रथ के पहिए के समान संयुक्त हो जा. (९) रात्रीभिरस्मा अहभिर्दशस्येत् सूर्यस्य चक्षुर्मुहुरुन्मिमीयात्. दिवा पृथिव्या मिथुना सबन्धू यमीर्यमस्य विवृहादजामि.. (१०) यमी—यम के निमित्त यजमान दिनरात आहुति दें. प्रकाश करने वाला सूर्य का तेज नित्यप्रति इस के निमित्त उदय हो. आकाश और पृथ्वी जिस प्रकार आपस में मिले हुए हैं. ebook converter DEMO Watermarks*