भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 789, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 789

यम—हे यमी! रस्सी जिस प्रकार घोड़े से मिलती है, बेल जैसे पेड़ से लिपट जाती है, उसी प्रकार तू किसी अन्य पुरुष से मिल. तुम दोनों परस्पर अनुकूल मन वाले बनो. इस के बाद तू अत्यधिक कल्याण वाले पुत्र को प्राप्त कर. (१६) त्रीणि च्छन्दांसि कवयो वि येतिरे पुरुरूपं दर्शतं विश्वचक्षणम्. आपो वाता ओषधयस्तान्येकस्मिन् भुवन आर्पितानि.. (१७) देवताओं ने संसार को ढकने का प्रयत्न किया. जल तत्त्व देखने में प्रिय लगने वाला तथा विश्व को देखने वाला है, वायु तत्त्व भी दर्शनीय और विश्व द्रष्टा है. ओषधि तत्त्व भी इसी प्रकार का है. इन तीनों तत्त्वों को देवताओं ने पृथ्वी का भरणपोषण करने के लिए प्रतिष्ठित किया है. (१७) वृषा वृष्णे दुदुहे दोहसा दिवः पयांसि यह्वो अदितेरदाभ्यः. विश्वं स वेद वरुणो यथा धिया स यज्ञियो यजति यज्ञियाँ ऋतून्.. (१८) महान अग्नि देव यजमान के निमित्त पाश आदि के द्वारा जल की वर्षा करते हैं. वे अपनी बुद्धि के माध्यम से सब को ऐसे जान लेते हैं, जैसे वरुण देव अपनी बुद्धि से सब को जानते हैं. ये ही अग्नि यज्ञ में देवों की पूजा करते हैं जो पूजा करने के योग्य हैं. (१८) रपद् गन्धर्वीरप्या च योषणा नदस्य नादे परि पातु नो मनः. इष्टस्य मध्ये अदितिर्नि धातु नो भ्राता नो ज्येष्ठः प्रथमो वि वोचति.. (१९) जल धारण करने वाले सूर्य की वाणी और अंतरिक्ष में विचरने वाली सरस्वती मेरे द्वारा अग्नि की स्तुति कराएं तथा मेरे स्तुति रूप नाद में मन की रक्षा करे. इस के बाद देवमाता अदिति मुझे फल के मध्य स्थापित करें. बंधु के समान हितकारी अग्नि मुझे उत्तम यजमान बनाएं. (१९) सो चिन्नु भद्रा क्षुमती यशस्वत्युषा उवास मनवे स्वर्वती. यदीमुशन्तमुशतामनु क्रतुमग्निं होतारं विदथाय जीजनन्.. (२०) अध्वर्यु जनों ने देवताओं का आह्वान कर के अग्नि को देवों के हेतु हव्य वहन के लिए प्रकट किया है. तभी कल्याणमयी मंत्र रूप वाणी तथा सूर्य से संबंध रखने वाली उषा यज्ञ आदि की सिद्धि के लिए प्रकट होती है. (२०) अध त्यं द्रप्सं विभ्वं विचक्षणं विराभरदिषिरः श्येनो अध्वरे. यदि विशो वृणते दस्ममार्या अग्निं होतारमध धीरजायत.. (२१) जब सोम के लाए जाने के बाद यह को पूरा करने वाली अग्नि का वरण किया जाता है, तब सोम और अग्नि के सिद्ध होने पर अग्निष्टोम आदि कर्म भी पूर्ण होते हैं. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*