भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 791, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 791

ही अग्नि सूर्य बन कर उषा की ओर अपनी किरणें प्रकाशित करते हैं. ये ही सूर्यात्मक अग्नि आकाश और पृथ्वी को सब ओर से प्रकाशित रखते हैं. (२७) प्रत्यग्निरुषसामग्रमख्यत् प्रत्यहानि प्रथमो जातवेदाः. प्रति सूर्यस्य पुरुधा च रश्मीन् प्रति द्यावापृथिवी आ ततान.. (२८) ये अग्नि उषाकाल में नित्य प्रकाशित होते तथा दिन के समय भी प्रकाश वाले रहते हैं. ये ही सूर्यात्मक अग्नि अनेक प्रकार से प्रकट होने वाली किरणों में भी प्रकाश भरते हैं. ये आकाश और पृथ्वी दोनों को प्रकाश से भर देते हैं. (२८) द्यावा ह क्षामा प्रथमे ऋतेनाभिश्रावे भवतः सत्यवाचा. देवो यन्मर्त्तान् यजथाप कृण्वन्त्सीदद्धोता प्रत्यङ् स्वमसुं यन्.. (२९) आकाश और पृथ्वी मुख तथा सत्य वाणी हैं. जब अग्नि देव यजमान के समीप आ कर यज्ञ संपन्न करने के लिए बैठे, तब ये आकाश और पृथ्वी स्तुति सुनने के योग्य हैं. (२९) देवो देवान् परिभूरृतेन वहा नो हव्यं प्रथमश्चिकित्वान्. धूमकेतुः समिधा भ्राऋजीको मन्द्रो होता नित्यो वाचा यजीयान्.. (३०) हे अग्नि! तुम प्रचंड ज्वालाओं से संपन्न हो. तुम पूज्य देवताओं को यज्ञ के द्वारा अपने वश में करते हुए तथा उन के पूजन की इच्छा करते हुए उन के पास हवि को पहुंचाओ. तुम धूम रूप ध्वजा वाले, समिधाओं से दीप्त होने वाले, देव वाहक तथा पूजा के पात्र हो. तुम हमारी हवि को देवों के समीप पहुंचाओ. (३०) अर्चामि वां वर्धयापो घृतस्नू द्यावाभूमी शृणुतं रोदसी मे. अहा यद् देवा असुनीतिमायन् मध्वा नो अत्र पितरा शिशीताम्.. (३१) हे आकाश और पृथ्वी के अधिष्ठाता देवताओ! मैं यज्ञकर्म की सिद्धि के लिए तुम्हारी स्तुति करता हूं. हे आकाश और पृथ्वी! तुम दोनों मेरी स्तुति को सुनो तथा जब ऋत्विज् अपने यज्ञ कार्य में लगा हो, तब तुम जल प्रदान के द्वारा हमारी वृद्धि करो. (३१) स्वावृग् देवस्यामृतं यदी गोरतो जातासो धारयन्त उर्वी. विश्वे देवा अनु तत् ते यजुर्गुर्दुहे यदेनी दिव्यं घृतं वाः.. (३२) अमृत के समान उपकार करने वाला जल जब किरणों से प्रकट होता है, तब ओषधियां आकाश और पृथ्वी में व्याप्त होती हैं. जब अग्नि की दीप्तियां अंतरिक्ष से टपकने वाले जल का दोहन करती हैं, तब हे अग्नि! उस जल का सब अनुगमन करते हैं जो तुम्हारे द्वारा प्रकट किया जाता है. (३२) किं स्विन्नो राजा जगृहे कदस्याति व्रतं चक्रमा को वि वेद. ebook converter DEMO Watermarks*