अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 793, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंवाले रूप में प्रसिद्ध हो, उसी प्रकार अपने धन के कारण भी विख्यात हो. तुम अपना धन मुझे प्रदान करो. (३८) स्तेगो न क्षामत्येषि पृथिवीं मही नो वाता इह वान्तु भूमौ. मित्रो नो अत्र वरुणो युज्यमानो अग्निर्वने न व्यसृष्ट शोकम्.. (३९) वर्षा ऋतु में मेढक जिस प्रकार पृथ्वी को लांघ जाता है, उसी प्रकार तुम पृथ्वी को लांघ कर ऊपर जाते हो. अग्नि की कृपा से वायु हमारे लिए सुखकर हो. मित्र एवं वरुण देवता भी हमें सुख देने वाले कार्य में लगें. अग्नि जिस प्रकार तिनकों आदि को भस्म करते हैं, उसी प्रकार हमारे शोक को समाप्त करें. (३९) स्तुहि श्रुतं गर्तसदं जनानां राजानं भीममुपहत्नमुग्रम्. मृडा जरित्रे रुद्र स्तवानो अन्यमस्मत् ते नि वपन्तु सेन्यम्.. (४०) हे स्तोता! उन रुद्र देवता की स्तुति करो, जिन का निवास स्थान श्मशान में है, जो पिशाच आदि के स्वामी हैं तथा जो पराक्रमी, भय उत्पन्न करने वाले तथा समीप आ कर हिंसित करने वाले हैं. हे दुःख का नाश करने वाले इंद्र! तुम हमारी स्तुति से प्रसन्न हो कर हमें सुख प्रदान करो. तुम्हारी सेना हम को त्याग कर उन पर आक्रमण करे जो हम से द्वेष रखते हैं. (४०) सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वतीमध्वरे तायमाने. सरस्वतीं सुकृतो हवन्ते सरस्वती दाशुषे वार्यं दात्.. (४१) मृतक संस्कार करने वाले तथा अग्नि की इच्छा करते हुए पुरुष सरस्वती का आह्वान करते हैं. हम ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों में भी सरस्वती को बुलाते हैं. देवी सरस्वती हवि प्रदान करने वाले यजमान को मनचाहा धन दें. (४१) सरस्वतीं पितरो हवन्ते दक्षिणा यज्ञमभिनक्षमाणाः. आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वमनमीवा इष आ धेह्यस्मे.. (४२) वेदी की दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठित पितर भी सरस्वती का आह्वान करते हैं. हे पितरो! तुम इस यज्ञ में विराजमान होते हुए प्रसन्न रहो. तुम सरस्वती को प्रसन्न करो तथा हवियों को प्राप्त कर के संतुष्ट बनो. हे सरस्वती! तुम पितरों के द्वारा बुलाई गई हो. तुम हम में ऐसे अन्न को स्थापित करो जो रागरहित और हमारा इच्छित है. (४२) सरस्वति या सरथं ययाथोक्यैः स्वधाभिर्देवि पितृभिर्मदन्ती. सहस्रार्घमिडो अत्र भागं रायस्पोषं यजमानाय धेहि.. (४३) हे सरस्वती! तुम अपनेआप को तृप्त करती हुई पितरों सहित एक ही रथ पर आती हो. अनेक व्यक्तियों तथा प्रजाओं को तृप्त कर के अन्न के भाग को और अन्न के बल को मुझ ebook converter DEMO Watermarks*