भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 794, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 794

यजमान को प्रदान करो. (४३) उदीरतामवर उत् परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः. असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नो ऽ वन्तु पितरो हवेषु.. (४४) अवस्था एवं गुणों में श्रेष्ठ, निकृष्ट एवं मध्यम श्रेणी के पितर भी उठें. ये पितर सोम का भक्षण करने वाले हैं. ये प्राण से उपलक्षित शरीर को प्राप्त होने वाले, अहिंसक और पदार्थ के ज्ञाता हैं. बुलाए जाने पर ये पितर हमारी रक्षा करें. (४४) आहं पितॄन्त्सुविदत्रां अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः. बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः.. (४५) मैं कल्याण करने वाले पितरों के सामने उपस्थित होता हूं. मैं यज्ञ की रक्षा करने वाले अग्नि के सामने उपस्थित होता हूं. इसलिए जो पितर बर्हिषद अर्थात् कुशाओं पर बैठने वाले हैं, वे स्वधा के साथ सोमरस पीते हैं. हे अग्नि! उन्हें मेरे समीप बुलाओ. (४५) इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो ये अपरास ईयुः. ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु दिक्षु.. (४६) जो पितर पहले पितरलोक को प्राप्त हुए थे तथा जो अब वहां गए हैं, जो अभी पृथ्वीलोक में ही हैं तथा जो भिन्नभिन्न दिशाओं में हैं, उन सभी पितरों को नमस्कार है. (४६) मातली कव्यैर्यमो अङ्गिारोभिर्बृहस्पतिर्ऋक्वभिर्वावृधानः. यांश्च देवा वावृधुर्यै च देवांस्ते नो ऽ वन्तु पितरो हवेषु.. (४७) मातलि नाम वाले पितृ देवता यजमान के द्वारा दिए गए हवि से कव्य नाम वाले पितरों के साथ वृद्धि पाते हैं. पितरों के नेता यम नाम के देव यजमान को इस हवि से अंगिरा नाम के पितरों के साथ बढ़ते हैं. मातलि आदि देवता जिन पितरों के यज्ञ में प्रबुद्ध करते हैं तथा जो कव्यादि की आहुति से प्रबुद्ध करते हैं, वे पितर आह्वान काल में हमारी रक्षा करें. (४७) स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतायं तीव्रः किलायं रसवां उतायम्. उतो न्व १ स्य पपिवांसमिन्द्रं न कश्चन सहत आहवेषु.. (४८) यह सोमरस निश्चित रूप से स्वादिष्ट है, यह सोमरस माधुर्य गुण से युक्त है. यह सोमरस पीने में निश्चित रूप से तीखा लगता है. यह सोम उत्तम स्वाद वाला है. इस को पीने के इच्छुक इंद्र को संग्राम में कोई भी सहन नहीं कर पाता. तात्पर्य यह है कि संग्राम में इंद्र के सामने कोई भी नहीं टिक पाता है. (४८) परेयिवांसं प्रवतो महीरिति बहुभ्यः पन्थामनुपस्पशानम्. वैवस्वतं संगमनं जनानां यमं राजानं हविषा सपर्यत.. (४९) ebook converter DEMO Watermarks*