अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 820, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपूपापिहितान् कुम्भान् यांस्ते देवा अधारयन्. ते ते सन्तु स्वधावन्तो मधुमन्तो घृतश्चुतः.. (६८) हे प्रेत! तेरे लिए देवों ने पूओं से ढके हुए तथा घी से भरे हुए घड़ों को धारण किया था, वे घड़े तेरे लिए घी टपकाने वाले हों. (६८) यास्ते धाना अनुकिरामि तिलमिश्रा स्वधावती:. तास्ते सन्तु विभी: प्रभ्वीस्तास्ते यामो राजानु मन्यताम्.. (६९) हे प्रेत! मैं तेरे लिए जो तिल से युक्त स्वधान वाले भुने जौ दे रहा हूं. वे तेरे लिए तृप्ति करने वाले हों. यमराज तुझे इन तिलों के उपयोग का आदेश प्रदान करें. (६९) पुनर्देहि वनस्पते य एष निहितस्त्वयि. यथा यमस्य सादन आसातै विदथा वदन्.. (७०) हे वनस्पति! तुझ में जो अस्थि रूप पुरुष अर्थात् पुरुष की हड्डियों का ढांचा छिपा हुआ है, उसे हमें प्रदान करो. जिस से वह यमराज के घर में यज्ञ संबंधी कार्य करता हुआ स्थित हो सके. (७०) आ रभस्व जातवेदस्तेजस्वद्धरो अस्तु ते. शरीरमस्य सं दहाथैनं धेहि सुकृतामु लोके.. (७१) हे अग्नि! तुम्हारी ज्वालाएं दहनशील अर्थात् जलाने वाली हैं. उन में रस का हरण करने वाली शक्ति आ जाए. तुम इस मृतक के शरीर को पूरी तरह से जलाओ. शरीर दहन के पश्चात इस पुरुष को पुण्य करने वालों के लोक स्वर्ग पहुंचाओ. (७१) ये ते पूर्वे परागता अपरे पितरश्च ये. तेभ्यो घृतस्य कुल्यै तु शतधारा व्युन्दती.. (७२) जो पहले उत्पन्न ज्येष्ठ पितर हम से मुंह मोड़ कर चले गए. उन के पश्चात जो उत्पन्न हुए, उन सभी पितरों के लिए घृत पूर्ण प्रवाह प्राप्त हो. वह धारा सौ संख्याओं वाली हो. इसलिए सभी को भिगोती हुई बहे. (७२) एतदा रोह वय उन्मृजानः स्वा इह बृहदु दीदयन्ते. अभि प्रेहि मध्यतो माप हास्थाः पितॄणां लोकं प्रथमो यो अत्र.. (७३) हे मृत पुरुष! तू इस दिखाई देने वाले अंतरिक्ष अर्थात् आकाश में आरूढ़ हो. तू आत्मा के उत्क्रमण से शरीर को शुद्ध करता हुआ अंतरिक्ष में आरूढ़ हो. तू अपने बंधुजनों के मध्य से लोकांतर को गमन कर. तेरे बंधु इस लोक में अधिक दीप्त हों. द्युलोक अर्थात् स्वर्ग पितरों से संबंधित मृत्युलोक है. तू उस लोक का त्याग मत कर अर्थात् वहां बहुत दिनों तक निवास ebook converter DEMO Watermarks*