अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 844, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरने के हेतु पुनः यहां आओ. (३) अनुहवं परिहवं परिवादं परिक्षवम्. सर्वैर्मे रिक्तकुम्भान् परा तान्तसवितः सुव.. (४) हे सविता देव! कार्य के निमित्त जाते हुए मुझ को तुम सभी नक्षत्रों में अनुभव नाम ले कर पीछे से बुलाना, परिहव नाम ले कर दोनों ओर से पुकारना. परिवाद अर्थात् कठोर भाषण, परिक्षव अर्थात् वर्जित स्थल में प्रवेश व खाली घड़े आदि देखना—अपशकुनों से बचाओ. (४) अपपापं परिक्षवं पुण्यं भक्षीमहि क्षवम्. शिवा ते पाप नासिकां पुण्यगन्ध्राभि मेहताम्.. (५) अहित करने वाली छींक हम से दूर हो. धन प्राप्ति के लिए जाते हुए पुरुष को गीदड़ी का दर्शन, उस का शब्द सुनना तथा नपुंसक का दर्शन—ये सभी हमारे पापों को शांत करने वाले हों. (५) इमा या ब्रह्मणस्पते विषूचीर्वात ईरते. सध्रीचीरिन्द्रा ताः कृत्वा मह्यं शिवतमास्कृधि.. (६) हे ब्रह्मणस्पति इंद्र! ये सभी दिशाएं आंधी के कारण धुंधली हो जाती हैं तथा पता नहीं चलता कि यह कौन सी दिशा है. उन अंधकार से ढकी हुई दिशाओं को मेरे अनुकूल करते हुए कल्याण करने वाली बनाओ. (६) स्वस्ति नो अस्त्वभयं नो अस्तु नमो ऽ होरात्राभ्यामस्तु.. (७) हमारा कल्याण हो तथा हमारा भय दूर हो. दिन और रात के लिए हमारा नमस्कार हो. (७) सूक्त-९ देवता—मंत्र में बताए हुए शान्ता द्यौः शान्ता पृथिवी शान्तमिदमुर्व१न्तरिक्षम्. शान्ता उदन्वतीरापः शान्ता नः सन्त्वोषधीः.. (१) अपने कारण से उत्पन्न दोषों को शांत करता हुआ द्युलोक हमें सुख प्रदान करे. विशाल अंतरिक्ष और पृथ्वी हमें सुख प्रदान करें. सागरों के जल तथा ओषधियां हमें सुख देने वाले हों. (१) शान्तानि पूर्वरूपाणि शान्तं नो अस्तु कृताकृतम्. शान्तं भूतं च भव्यं च सर्वमेव शमस्तु नः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*