भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 867, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 867

परीममिन्द्रमायुषे महे क्षत्राय धत्तन. यथैनं जरसे याज् ज्योक् क्षत्रे ऽ धि जागरत्... (२) हे परम ऐश्वर्य संपन्न इंद्र! मुझ साधक को आयु और महान बल लाभ करने के लिए स्थापित करो. चिरकाल तक बाधा नष्ट करने वाला बल प्राप्त होने पर यह शांतिकर्ता यजमान जागृत रहे. इसे वृद्धावस्था को प्राप्त कराओ. (२) परीमं सोमायुषे महे श्रोत्राय धत्तन. यथैनं जरसे याज् ज्योक् श्रोत्रे ऽ धि जागरत्.. (३) हे सोम! शांतिकर्ता मुझ यजमान को चिरकालीन जीवन के लिए तथा इंद्रियों से साध्य उपदान आदि कार्यों के लिए सभी ओर से धारण करो. चिरकाल तक सभी इंद्रियां सक्रिय रहने पर यह शांतिकर्ता यजमान जागृत रहे. इसे वृद्धावस्था को प्राप्त कराओ. (३) परि धत्त धत्त नो वर्चसेमं जरामृत्युं कृणुत दीर्घमायुः. बृहस्पतिः प्रायच्छद् वास एतत् सोमाय राज्ञे परिधातवा उ.. (४) हे देवो! इस ब्रह्मचारी को वस्त्र धारण कराओ. हमारे इस ब्रह्मचारी को तेज से पोषित करो. वृद्धावस्था ही इसकी मृत्यु करने वाली हो. इसे ऐसी दीर्घ आयु वाला बनाओ. बृहस्पति ने यह वस्त्र राजा सोम को धारण करने के हेतु दिया था. (४) जरां सु गच्छ परि धत्स्व वासो भवा गृष्टीनामभिशस्तिपा उ. शतं च जीव शरदः पुरूची रायश्व पोषमुपसंव्ययस्व.. (५) हे शांति प्रयोक्ता! तुम वृद्धावस्था को प्राप्त करो. तुम इस वस्त्र को धारण करो. तुम गायों को हिंसा के भय से बचाने वाले बनो. तुम अनेक प्रकार के पुत्रपौत्रों को प्राप्त करने वाली सौ शरद् ऋतुओं तक जीवित रहो. तुम धन और पुष्टि धारण करो. (५) परीदं वासो अधिथाः स्वस्तये ऽ भूर्वापीनामभिशस्तिपा उ. शतं च जीव शरदः पुरूचीर्वसूनि चारुवि भजासि जीवन्.. (६) हे शांतिकर्ता यजमान! तुम ने यह वस्त्र क्षेम अर्थात् पात्र की रक्षा के लिए धारण किया है. इस वस्त्र को धारण कर के तुम गायों को चमड़ा उतारने के भय से रक्षा करने वाले बनो. तुम अनेक प्रकार के पुत्रपौत्रों को प्राप्त कराने वाली सौ शरद् ऋतुओं तक जीवित रहो. सौ वर्ष तक जीवित रहने वाले तुम सुंदर वस्त्र से सुशोभित रहो तथा धनों को पुत्र, मित्र आदि में विभाजित करो. (६) योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे. सखाय इन्द्रमूतये.. (७) हम स्तुतिकर्ता सभी अप्राप्त फलों की प्राप्ति होने पर तथा अन्नादि की प्राप्ति होने पर ebook converter DEMO Watermarks*