भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 887, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 887

त्रिः शाम्बुभ्यो अङ्गिरेभ्यस्त्रिरादित्येभ्यस्परि. त्रिर्जातो विश्वेदेवेभ्यः. स कुष्ठो विश्वभेषजः साकं सोमेन तिष्ठति. तक्मानं सर्वं नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः.. (५) हे कुष्ठ ओषधि! तुम अंगिरा गोत्रीय ऋषियों की संतान शांबु नाम के ऋषियों से तीन बार उत्पन्न हुए, आदित्यों से तीन बार उत्पन्न तथा विश्वे देवों से तीन बार उत्पन्न कहे जाते हो. सभी रोगों की ओषधि कुष्ठ सोम के साथ स्थित होती हैं. तुम सभी रोगों तथा सभी राक्षसियों का नाश करो. (५) अश्वत्थो देवसदनस्तृतीयस्यामितो दिवि. तत्रामृतस्य चक्षणं ततः कुष्ठो अजायत. स कुष्ठो विश्वभेषजः साकं सोमेन तिष्ठति. तक्मानं सर्वं नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः.. (६) इस भूलोक से तीसरे द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में देवों का घर पीपल का वृक्ष है. उस पीपल पर मरण रहित सोम उत्पन्न हुआ है. उस सोम से कुष्ठ ओषधि उत्पन्न हुई है. सभी रोगों की ओषधि यह कुष्ठ सोम के साथ स्थित होता है. हे कुष्ठ! तुम सभी रोगों और सभी राक्षसियों का नाश करो. (६) हिरण्ययी नौरचरद्धिरण्यबन्धना दिवि. तत्रामृतस्य चक्षणं ततः कुष्ठो अजायत. स कुष्ठो विश्वभेषजः साकं सोमेन तिष्ठति. तक्मानं सर्वं नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः.. (७) स्वर्ग में सोने से बनी रस्सी से बंधी हुई सोने की नाव घूमती रहती है. वहां मरणरहित सोम की उत्पत्ति हुई है. उस सोम से कुष्ठ उत्पन्न हुआ है. सभी रोगों की ओषधि यह कुष्ठ सोम के साथ स्थित रहता है. हे कुष्ठ! तुम सभी रोगों और राक्षसियों का विनाश करो. (७) यत्र नावप्रभ्रंशनं यत्र हिमवतः शिरः. तत्रामृतस्य चक्षणं ततः कुष्ठो अजायत. स कुष्ठो विश्वभेषजः साकं सोमेन तिष्ठति. तक्मानं सर्वं नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः.. (८) जिस स्वर्ग से उत्तम कर्म करने वालों का पतन नहीं होता तथा जहां हिमवान पर्वत शीश अर्थात् सब से ऊंचा शिखर है वहां अमृत की स्थिति है. उस अमृत से कुष्ठ उत्पन्न हुआ है. सभी रोगों की ओषधि कुष्ठ वहां स्वर्ग में सोम से संबंधित रहता है. हे कुष्ठ! सभी रोगों और राक्षसियों का विनाश करो. (८) ebook converter DEMO Watermarks*