अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 893, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे वरुण! हम ने जो कहा था, तुम जल के स्वामी होने के कारण उसे जानते हो. हे गायो! तुम मेरे चित्त को जानती हो. हे वरुण! मैं ने जो कहा है, उसे तुम जानते हो. हे हजार गुणी शक्ति वाले आंजन! हमें उस पाप से मुक्ति दिलाओ. (९) मित्रश्च त्वा वरुणश्चानुप्रेयतुराञ्जन. तौ त्वानुगत्य दूरं भोगाय पुनरोहतुः.. (१०) हे आंजन! मित्र देव और वरुण देव तुम्हारे पीछेपीछे भूमि पर पहुंचे तथा बाद में स्वर्ग को गए. तुम सुख का उपभोग करने के लिए उन्हें लाओ. (१०) सूक्त-४५ देवता—आंजन ऋणादृणमिव संनयन् कृत्यां कृत्याकृतो गृहम्. चक्षुर्मन्त्रस्य दुर्हर्दः पृष्टीरपि शृणाञ्जन.. (१) हे आंजन! जिस प्रकार ऋण लेने वाला धन ऋण दाता को लौटा देता है, उसी तरह मुझे पीड़ा पहुंचाने वाली कृत्या नाम की राक्षसी को उसी के घर भेज दो, जिस ने उसे मेरे पास भेजा है. हे आदित्य के चक्षु आंजन! दुष्ट हृदय वालों के समीपवर्तियों का भी विनाश करो. (१) यदस्मासु दुष्षप्न्यं यद् गोषु यच्च नो गृहे. अनामगस्तं च दुर्हर्दः प्रियः प्रति मुञ्चताम्.. (२) हमारे पुत्र, पौत्र आदि में जो बुरा स्वप्न है, हमारी गायों से संबंधित जो बुरा स्वप्न है, हमारे घर में स्थित दास आदि का जो बुरा स्वप्न है, उसे नाम रहित शत्रुओं के लिए छोड़ दो. (२) अपामूर्ज ओजसो वावृधानमग्नेर्जातमधि जातवेदसः. चतुर्वीरं पर्वतीयं यदाञ्जनं दिशः प्रदिशः करदिच्छिवास्ते.. (३) हे जल के सार, ओज को बढ़ाने वाले तथा जातवेद अग्नि से उत्पन्न तथा त्रिककुद नाम के पर्वत पर जन्म लेने वाले आंजन! मेरे लिए दिशाओं और प्रदिशाओं को मंगलकारी बनाओ. (३) चतुर्वीरं बध्यत आञ्जनं ते सर्वा दिशो अभयास्ते भवन्तु. ध्रुवस्तिष्ठासि सवितेव चार्य इमा विशो अभि हरन्तु ते बलिम्.. (४) हे रक्षा रूपी फल की कामना करने वाले पुरुष! तेरे हाथ में चारों दिशाओं में शक्ति का प्रदर्शन करने वाली आंजन मणि रूपी ओषधि अर्थात् जड़ी बांधी जाती है. इस मणि को धारण करने से तेरी दिशाएं और प्रदिशाएं भय रहित हो जाएं. हे अधिकार संपन्न आंजन! तुम ebook converter DEMO Watermarks*