भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 896, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 896

सभी देव तुझे अपने कार्यों की सिद्धि के लिए अपनेअपने कवचों से आच्छादित करें. हे आस्तृत मणि! सब देव तुम्हारी रक्षा करें. (४) अस्मिन् मणावेकशंतं वीर्याणि सहस्रं प्राणा अस्मिन्नस्तृते. व्याघ्रः शत्रूनभि तिष्ठ सर्वान् यस्त्वा पृतन्यादधरः सो अस्तवस्तृतस्त्वाभि रक्षतु.. (५) इंद्र के कवच से सुरक्षित होने के कारण इस आस्तृत मणि के एक सौ एक सामर्थ्य हैं तथा हजारों प्राण अर्थात् बल हैं. तुम बाघ के समान सभी शत्रुओं पर आक्रमण कर के उन्हें पराजित करने में समर्थ बनो. मेरा जो शत्रु तुझ मणि से युद्ध करने की इच्छा करे, वह पराजित हो. हे आस्तृत मणि! सब देव तुम्हारी रक्षा करें. (५) घृतादुल्लुप्तो मधुमान् पयस्वान्त्सहस्रप्राणः शतयोनिर्वयोधाः. शंभूश्च मयोभूश्चोर्जस्वांश्च पयस्वांश्चास्तृतस्त्वाभि रक्षतु.. (६) ऊपर के भाग में घी से लिए हुए, शहद से युक्त, दूध से संपन्न, सभी देवों से अनुगृहीत होने के कारण हजारों शक्तियों से पूर्ण, इंद्र के कवच से सुरक्षित होने के कारण सौ बलों से संपन्न, मणि धारक पुरुष को अन्न प्रदान करने वाले, सुख देने वाले, सुविधा प्रदान करने वाले, अन्न के दाता तथा दूध आदि देने वाले आस्तृत नाम की इस मणि की सभी देव रक्षा करें. (६) यथा त्वमुत्तरो ऽ सो असपत्नः सपत्नहा. सजातानामसद वशी तथा त्वा सविता करदस्तृतस्त्वाभि रक्षतु.. (७) हे साधक! तुम सब से श्रेष्ठ बनो. कोई तुम्हारा शत्रु न बने तथा तुम सभी शत्रुओं का विनाश करो. तुम अपने सजातीय जनों के मध्य में दूसरों को वश में करने वाले बनो. सविता देव मणि बांधने वाले तुम को इसी प्रकार का करें. आस्तृत मणि तुम्हारी रक्षा करे. (७) सूक्त-४७ देवता—रात्रि आ रात्रि पार्थिवं रजः पितुरप्रायि धामभिः. दिवः सदांसि बृहती वि तिष्ठस आ त्वेषं वर्तते तमः.. (१) हे रात्रि! तुम ने अपने अंधकारों से पृथ्वीलोक तथा पितरों के लोक स्वर्ग को पूर्ण कर दिया है. महती रात्रि द्युलोक के स्थानों को विशेष रूप ये व्याप्त करती है. नील वर्ण का अंधकार सब को व्याप्त करता है. (१) न यस्याः पारं ददृशे न योयुवद् विश्वमस्यां नि विशते यदेजति. अरिष्टासस्त उर्व तमस्वति रात्रि पारमशीमहि भद्रे पारमशीमहि.. (२) रात का पार दिखाई नहीं देता है. लोक व्यापिनी रात्रि में चराचर विश्व एकाकार ही हो ebook converter DEMO Watermarks*