भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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पृष्ठ 899

करने वाले हों. (४) ये रात्रिमनुतिष्ठन्ति ये च भूतेषु जाग्रति. पशून् ये सर्वान् रक्षन्ति ते न आत्मसु जाग्रति ते नः पशुषु जाग्रति.. (५) जो मनुष्य रात्रि के समय अर्चनपूजन आदि अनुष्ठान करते हैं तथा जो भवन संबंधी प्राणियों के कारण जागते हैं, जो सभी पशुओं की रक्षा करते हैं, वे हमारे तथा हमारे पुत्र आदि की रक्षा के लिए जागते हैं, वे पशुओं की रक्षा के लिए भी जागें. (५) वेद वै रात्रि ते नाम घृताची नाम वा असि. तां त्वां भरद्वाजो वेद सा नो वित्ते ऽ धि जाग्रति.. (६) हे रात्रि! मैं तेरे नामों को जानता हूं. तू दीप्तिमती नाम वाली है. ऐसी तुझ रात्रि को भरद्वाज जानते हैं. वह रात्रि हमारे धन की रक्षा के लिए जागृत रहे. (६) सूक्त-४९ देवता—रात्रि इषिरा योषा युवतिर्दमूना रात्री देवस्य सवितुर्भर्गस्य. अश्वक्षभा सुहवा संभृतश्रीरा पप्रौ द्यावापृथिवी महित्वा.. (१) सब के द्वारा प्रार्थनीय, यौवन वाली तथा श्रेष्ठ मन वाली रात्रि सभी के प्रेरक सविता और भग देव की पत्नी है. यह अपने विषय में चक्षु आदि इंद्रियों का तिरस्कार करती है. यह उत्तम हवन करने योग्य तथा संपूर्ण कांति वाली रात्रि अपने महत्त्व से द्यावा और पृथ्वी को पूर्ण करती है. (१) अति विश्वान्यरुहद् गम्भीरो वर्षिष्ठमरुहन्त श्रविष्ठाः. उशती रात्र्यनु सा भद्राभि तिष्ठते मित्र इव स्वधाभिः.. (२) जिस में प्रवेश करना कठिन है, ऐसी रात्रि सभी चराचर वस्तुओं को व्याप्त कर के वर्तमान है. इस अतिशय अन्न वाली रात्रि की सब स्तुति करते हैं. यह वन, पर्वत, सागर आदि को व्याप्त कर के स्थित है. यजमान आदि के द्वारा प्रदत्त अन्न आदि साधनों से सूर्य जिस प्रकार अपने तेज से प्रतिक्षण विश्व को आक्रांत करते हैं, उसी प्रकार यह रात्रि भी जगत् पर छा जाती है. (२) वर्यै वन्दे सुभगे सुजात आजगन् रात्रि सुमना इह स्याम्. अस्मांस्त्रायस्व नर्याणि जाता अथो यानि गव्यानि पुष्ट्या.. (३) हे न रुकने वाले प्रभाव वाली, सभी के द्वारा स्तुति की गई, सौभाग्य वाली तथा भलीभांति उत्पन्न रात्रि! तुम आ गई हो. तुम्हारे आने पर मैं सुंदर मन वाला बनूं. मेरा पालन करो तथा उत्पन्न वस्तुओं को, मनुष्यों की हितकारी वस्तुओं को तथा पुष्ट करने वाली गाय ebook converter DEMO Watermarks*