अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 900, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि जो हितकारी वस्तुएं हैं, उन की रक्षा करो. (३) सिंहस्य रात्र्युशती पींपस्य व्याघ्रस्य द्वीपिनो वर्च आ ददे. अश्वस्य ब्रध्नं पूरुषस्य मायुं पुरु रूपाणि कृणुषे विभाती.. (४) इच्छा करती हुई यह रात्रि सिंह, हाथी, गैंडा, बाघ आदि के तेजों का अपहरण करती है. यह अश्व के वेग को तथा पुरुष के शब्द को खींच लेती है. हे रात्रि! तुम दीप्तिमती हो कर नाना प्रकार के रूप धारण करती हो. (४) शिवां रात्रिमनुसूर्यं च हिमस्य माता सुहवा नो अस्तु. अस्य स्तोमस्य सुभगे नि बोध येन त्वा वन्दे विश्वासु दिक्षु.. (५) हे रात्रि! मैं कल्याण करने वाली तेरी तथा सूर्य की वंदना करता हूं. तुषार की माता रात्रि हमारे उत्तम आह्वान का विषय हो. हे सौभाग्यशालिनी रात्रि! तुम इस समय किए जाते हुए हमारे स्तोत्र को जानो. इस स्तोत्र के द्वारा हम सभी दिशाओं में तेरी वंदना करते हैं. (५) स्तोमस्य नो विभावरि रात्रि राजेव जोषसे. आसाम सर्ववीरा भवाम सर्ववेदसो व्युच्छन्तीरनुषस:.. (६) हे प्रकाशित होती हुई रात्रि! जिस प्रकार राजा स्तोताओं के द्वारा की जाती हुई स्तुति को ध्यानपूर्वक सुनता है, उसी प्रकार तुम हमारी स्तुतियों को सावधान हो कर सुनो. अंधकार का विनाश करती हुई एवं उषा:काल के पश्चात आती हुई रात्रि की कृपा से हम वीर पुत्रों, पौत्रों और सेवकों वाले बनें तथा सभी प्रकार के धन से संपन्न हों. (६) शम्या ह नाम दधिषे मम दिप्सन्ति ये धना. रात्रीहि तानसुतपा य स्तेनो न विद्यते यत् पुनर्न विद्यते.. (७) हे रात्रि! तुम शम्या अर्थात् शत्रु के बल को शांत करने वाला नाम धारण करती हो. जो शत्रु मेरे धनों का अपहरण करने की इच्छा करते हैं, हे रात्रि! तुम उन शत्रुओं के प्राणों को संतप्त करती हुई आओ. मेरा विरोधी जो दिखाई दे रहा है, वह पुनः दिखाई न दे. (७) भद्रासि रात्रि चमसो न विष्टो विष्वङ् गोरूपं युवतिर्बिभर्षि. चक्षुष्मती मे उशती वपूंषि प्रति त्वं दिव्या न क्षाममुक्था:.. (८) हे रात्रि! तुम चम्मच के समान कल्याण रूपा हो. तुम सर्वत्र व्याप्त यौवन वाली गाय का रूप धारण करती हो. हमारा पोषण करने की कामना करती हुई एवं देखने की शक्ति से संपन्न तुम मेरे तथा मेरे पुत्र आदि के शरीरों की रक्षा करो. जिस प्रकार दिव्य पुरुष शरीर का त्याग नहीं करते, उसी प्रकार तुम धरती को मत छोड़ो. (८) यो अद्य स्तेन आयत्यघायुर्मर्त्यो रिपु:. ebook converter DEMO Watermarks*