अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 902, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंअप स्तेनं वासो गोअजमुत तस्करम्. अथो यो अर्वतः शिरो ऽ भिधाय निनीषति.. (५) जो चोर हमारे वस्त्र, गायें तथा बकरियां ले जाना चाहते हैं तथा जो हमारे घोड़ों के सिरों को रस्सी से बांध कर ले जाना चाहते हैं, उन्हें दूर भगाओ. (५) यदद्या रात्रि सुभगे विभजन्त्ययो वसु. यदेतदस्मात् भोजय यथेदन्यानुपायसि.. (६) हे सौभाग्यशालिनी रात्रि! आज जो चोर स्वर्ण आदि धातुओं का अपहरण करते हैं, उस धन को हमारे उपभोग का साधन बनाओ. इस से शत्रु द्वारा छीने गए हमारे घोड़े, हाथी भी हमें प्राप्त हो जाएं. (६) उषसे नः परि देहि सर्वान् रात्र्यनागसः. उषा नो अह्ने आ भजादहस्तुभ्यं विभावरि.. (७) हे रात्रि! हम सभी स्तुतिकर्ताओं तथा पशुओं, पुत्रों, मित्र आदि को रक्षण के लिए उषा को प्रदान करो. हे विभावरी! उषः हम सब को दिन प्रदान करे तथा दिन पुनः तुम्हें प्राप्त करे. (७) सूक्त-५१ देवता—आत्मा, सविता अयुतो ऽ हमयुतो म आत्मायुतं मे चक्षुरयुतं मे श्रोत्रमयुतो मे. प्राणो ऽ युतो मे ऽ पानो ऽ युतो मे व्यानो ऽ युतो ऽ हं सर्वः.. (१) कर्म का अनुष्ठान करने का इच्छुक मैं पूर्ण हूं. मेरा शरीर पूर्ण है, मेरी आत्मा पूर्ण है, मेरे नेत्र, कान, मेरी प्राण वायु, मेरी अपान वायु तथा मेरी व्यान वायु पूर्ण है. इस प्रकार मैं सभी दृष्टि से पूर्ण हूं. (१) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऽ श्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां प्रसूत आ रभे.. (२) हे कर्म! मैं सब के प्रेरक सविता देव की आज्ञा से, अश्विनीकुमारों की भुजाओं से तथा पूषा देव के हाथों से तेरा आरंभ करता हूं. (२) सूक्त-५२ देवता—काम कामस्तदग्रे समवर्तत मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्. स काम कामने बृहता सयोनी रायस्पोषं यजमानाय धेहि.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*