अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 906, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंकालो यज्ञं समैरयद्देवेभ्यो भागमक्षितम्. काले गन्धर्वाप्सरसः काले लोकाः प्रतिष्ठिताः.. (४) काल ने यज्ञ को देवताओं के भाग के रूप में प्रकट किया. काल में गंधर्व, अप्सराएं एवं सब लोक प्रतिष्ठित हैं. (४) काले ऽ यमङ्गिरा देवो ऽ थर्वा चाधि तिष्ठतः. इमं च लोकं परमं च लोकं पुण्यांश्च लोकान् विधृतीश्च पुण्याः. सर्वांल्लोकानभिजित्य ब्रह्मणा कालःस ईयते परमो नु देवः.. (५) ये अंगिरा देव और अथर्वा ऋषि अधिष्ठित हैं. इस लोक को, परलोक को, पुण्यलोकों को, दुःखरहित लोकधारकों को, सभी कहे गए और बिना कहे गए लोकों को यह ब्रह्म रूप काल व्याप्त कर के उत्तम काल देव सभी स्थावर और जंगम जगत् को उत्पन्न करता है. (५) सूक्त—५५ देवता—अग्नि रात्रिंरात्रिम्प्रयातं भरन्तो ऽ श्वायेव तिष्ठते घासमस्मै. रायस्पोषेण समिषा मदन्तो मा ते अग्ने प्रतिवेशा रिषाम (१) हे अग्नि देव! तुम यज्ञ के साधन के रूप में गार्हपत्य आदि यज्ञशालाओं में वर्तमान हो. जिस प्रकार घोड़े को घास दी जाती है, उसी प्रकार तुम्हारे लिए हम यह खाने योग्य हवि रातदिन प्रदान करते हुए अन्न और धन से प्रसन्न होते हुए तुम्हारा सामीप्य प्राप्त करें तथा हमें नाश की प्राप्ति न हो. (१) या ते वसोर्वात इषुः सा त एषा तया नो मृड. रासस्पोषेण समिषा मदन्तो मा ते अग्ने प्रतिवेशा रिषाम.. (२) हे निवास करने वाले अग्नि देव! तुम्हारी तथा अन्य देवों की जो कृपामयी बुद्धि है, अपनी इस बुद्धि से हमारी रक्षा करो. धन और अन्न से प्रसन्न होते हुए हम तुम्हारा सामीप्य प्राप्त करें और हम नाश को प्राप्त न हों. (२) सायंसायं गृहपतिर्नो अग्निः प्रातःप्रातः सौमनसस्य दाता. वसोर्वसोर्वसुदान एधि वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम.. (३) गृहपति द्वारा आधान की गई अग्नि सायं और प्रातः तथा सभी कालों में सुख को देने वाली हो. हे अग्नि! तुम सभी प्रकार के धनों को देने वाली बनो. तुम्हें हवि के द्वारा प्रदीप्त करते हुए हम पुत्र, मित्र आदि सभी के शरीरों को पुष्ट करें. (३) प्रातःप्रातर्गृहपतिर्नो अग्निः सायंसायं सौमनसस्य दाता. वसोर्वसोर्वसुदान एधीन्धानास्त्वा शतंहिमा ऋधेम.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*