अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 951, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिन के पास मांगने वालों को देने के लिए बहुत सी गाएं, अश्व, ग्राम, रथ, गज, ऊंट आदि सब कुछ है, जिन्होंने प्रकाश के लिए सूर्य का उदय किया है तथा उषा को प्रकट किया है, जो वर्षा के जल के प्रेरक हैं, वे ही इंद्र हैं. (७) यं क्रन्दसी संयती विह्वयेते परे ऽ वर उभया अमित्राः. समानं चिद्रथमातस्थिवांसा नाना हवेते स जनास इन्द्रः.. (८) आकाश और पृथ्वी दोनों एकमत हो कर इंद्र का आह्वान करते हैं. द्युलोक हवि के लिए तथा पृथ्वी वर्षा के लिए इंद्र को बुलाते हैं. समान रथ में बैठे हुए सेनापति जिन्हें बुलाते हैं, वे ही इंद्र हैं. (८) यस्मान्न ऋते विजयन्ते जनासो यं युध्यमाना अवसे हवन्ते. यो विश्वस्य प्रतिमानं बभूव या अच्युतच्युत् स जनास इन्द्रः.. (९) इंद्र की सहायता के बिना विजय की कामना करने वाले लोग अपने शत्रुओं को पराजित नहीं कर सकते. इसी कारण वे युद्ध के अवसर पर इंद्र को बुलाते हैं. जो अचल पर्वतों को हटाने में समर्थ हैं तथा जो प्राणियों का पुण्य देखते हैं, वे इंद्र हैं. (९) यः शश्वतो मह्योनो दधानानमन्यमानाञ्छर्वा जघान. यः शर्धते नानुददाति श्रुध्यां यो दस्योर्हन्ता स जनास इन्द्रः.. (१०) जो लोग महान अपराधी हैं, इंद्र की सत्ता को नहीं मानते हैं. इंद्र उन्हें हिंसित करते हैं. जो अपने कर्मों में इंद्र की अपेक्षा नहीं करते, इंद्र उन के प्रतिकूल रहते हैं. जो वृत्र आदि असुरों के हिंसक हैं, वे इंद्र हैं. (१०) यः शम्बरं पर्वतेषु क्षियन्तं चत्वारिंश्यं शरदन्वविन्दत्. ओजायमानं यो अहिं जघान दानुं शयानं स जनास इन्द्रः.. (११) जिन्होंने चालीस वर्ष तक पर्वत में छिप कर रहते हुए शंबर असुर का वध किया, जिन्होंने शमन करने वाले शक्तिशाली वृत्र का संहार किया, वे इंद्र हैं. (११) यः शम्बरं पर्यतरत् कसीभियों ऽ चारुकास्नापिबत् सुतस्य. अन्तर्गिरौ यजमानं जनं बहुं यस्मिन्नामूर्च्छत् स जनास इन्द्रः.. (१२) जिन की हिंसा करने के लिए असुरों ने सोमपान करने वाले अध्वर्युजनों को घेर लिया था, जिन्होंने अपने वज्र से शंबर का दमन किया तथा जो संस्कार किए हुए सोमरस को पी चुके हैं, वे इंद्र हैं. (१२) यः सप्तरश्मिर्वृषभस्तुविष्मानवासृजत् सर्तवे सप्त सिन्धून्. यो रौहिणमस्फुरद् वज्रबाहुर्द्यामारोहन्तं स जनास इन्द्रः.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*