भारतकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

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१५ यह कथन ठीक नहीं है क्योंकि स्थूल सूक्ष्म शरीर अभिमानी चेतन त्वंपद का वाच्यार्थ है। उपाधि से सर्वथा मुक्त समाधिदशासम्पन्न शुद्ध चैतन्य त्वंपद का लक्ष्यार्थ है। इसी प्रकार सर्वज्ञत्वादि धर्म से विशिष्ट ईश्वर तत्पद का वाच्यार्थ है और उपाधिशून्य शुद्ध चैतन्य तत्पद का लक्ष्यार्थ है। इस प्रकार चैतन्यरूप लक्ष्यार्थ को लेकर जीव और ईश्वर का अभेद होने से कोई बाधक नहीं है। लोक में भी मुख्यार्थ को लेने पर यदि विरोध उपस्थित होता है तो लक्षणा की जाती है। लक्षणा का बीज, तात्पर्य की अनुपपत्ति को माना गया है (तात्पर्य का संभव नहीं हो पाना ही तात्पर्य-अनुपपत्ति है।) लक्षणा ३ प्रकार की होती है, जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा और जहदजहल्लक्षणा (भाग-त्याग लक्षणा)। जिसमें वाच्यार्थ को छोड़कर लक्ष्यार्थ को लिया जाता है, उसे जहल्लक्षणा कहते हैं। जैसे 'गंगायां घोषः' (गंगा में अहीरों की बस्ती) यहाँ गंगा का अर्थ 'प्रवाह' न लेकर लक्ष्यार्थ तीर लिया जाता है। जिसमें वाच्यार्थ को न छोड़ते हुए लक्ष्यार्थ को भी लिया जाता है, उसे अजहल्लक्षणा कहते हैं। जैसे 'छत्रिणो यान्ति' कहने पर छाताधारी पुरुषों के साथ छातारहित पुरुषों का भी ग्रहण किया जाता है। जिसमें विरुद्ध अंशों को छोड़कर अविरुद्ध अंश मात्र का ग्रहण किया जाता है, उसे जहदजहल्लक्षणा या भाग-त्याग लक्षणा कहते हैं। जैसे- 'सोऽयं' देवदत्तः' में विरुद्ध-अंश तद्देश-एतद्देश, तत्काल-एतत्काल आदि को छोड़कर अविरुद्ध अंश व्यक्ति मात्र को लेकर वाक्यार्थ- बोध होता है। इसी प्रकार 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों में भाग-त्याग