भारतकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

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१४ स्थूल शरीर में अभिमान करने वाला ब्रह्मप्रतिबिम्ब जीव नामवाला होता है। वही जीव अविद्या के कारण अपने में ही जीव-ईश्वर भेददृष्टि का आरोप करता है। कैसे ? तो इसका उत्तर है- अविद्या उपाधि वाला आत्मा जीव नाम से कहा जाता है।।३३।। मायोपाधिः सन्नात्मा ईश्वर इत्युच्यते। एवमुपाधिभेदाज्जी- वेश्वरभेददृष्टिर्यावत्पर्यन्तं तिष्ठति, तावत्पर्यन्तं जन्म- मरणादिरूपसंसारो न् निवर्तते। तस्मात् कारणाज्जीव एव ईश्वर ईश्वर एव जीव इतीतराभेददृष्टिं जानीयात् ।।३४।। माया उपाधि वाले चेतन को ईश्वर कहा गया है। इस प्रकार उपाधिभेद से जीव-ईश्वर में भेददृष्टि जब तक रहती है, जब तक जन्म मरणरूपी संसार निवृत्त नहीं होता। इसीलिए जीव-ईश्वर में 'जीव ही ईश्वर' 'ईश्वर ही जीव' इस प्रकार अभेद दृष्टि करनी चाहिए ।।३४।। ननु साहङ्कारस्य किञ्चिज्ज्ञस्य जीवस्य निरहङ्कारस्य सर्वज्ञ- स्येश्वरस्य च कथमभेदबुद्धिः स्यादुभयोर्विरुद्धधर्माक्रा- न्तत्वादिति चेत् ? न। स्थूलसूक्ष्मशरीराभिमानी त्वम्पदवाच्योऽर्थः, उपाधिविनिर्मुक्तं समाधिदशासम्पन्नं शुद्धचैतन्यं च त्वंपदल- क्ष्योऽर्थः । एवं सर्वज्ञत्वादिविशिष्ट ईश्वरस्तत्पदवाच्यः, उपाधिशून्यं शुद्धचैतन्यं च तत्पदलक्ष्यम्। एवं च लक्ष्यार्थमादाय जीवेश्वरयोरभेदे बाधकाभावः ।।३५।। अहंकारयुक्त अल्पज्ञ जीव और अहंकार रहित सर्वज्ञ ईश्वर का तत्त्वमसि इस महावाक्य से अभेदज्ञान कैसे हो सकेगा, क्योंकि ये जीव और ईश्वर दोनों विरुद्ध धर्म से आक्रान्त है ?