आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ नष्ट हो जाते हैं। कमलपत्र पर निर्लिप्त जल की भाँति ज्ञानियों का आगामी कर्म के साथ सम्बन्ध नहीं होता ।।४२।। किञ्च ये ज्ञानिनं स्तुवन्ति भजन्त्यर्चयन्ति च, तान प्रति ज्ञानिकृतागामिपुण्यं गच्छति । ये च ज्ञानिनं निन्दन्ति द्विषन्ति दुःखप्रदानं कुर्वन्ति, तान्प्रति ज्ञानिकृतं सर्वमागामिक्रियमाणपदवाच्यं कर्म पापात्मकं गच्छति। तथा च श्रुतिः “सुहृदः पुण्यकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्यां गृहणन्तीति”। तथा चात्मवित् संसारं तीर्त्वा ब्रह्मानन्दमिहैव प्राप्नोति। “तरति शोकमात्मविदि”त्यादिश्रुतेः। तनुं त्यजतु वा काश्यां श्वपचस्य गृहेऽथवा। ज्ञानसम्प्राप्तिसमये मुक्तोऽसौ विगताशयः॥ इति स्मृतेश्च।४३।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्य- पादशिष्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ तत्त्वबोधः समाप्तः।। जो ज्ञानी की स्तुति करते हैं, सेवा करते हैं तथा पूजा करते हैं; ज्ञानियों का किया हुआ आगामी पुण्य कर्म उन्हीं के पास चला जाता है और जो ज्ञानी की निन्दा करते हैं, द्वेष करते हैं तथा दुःख देते हैं, उनके प्रति ज्ञानियों का किया हुआ सम्पूर्ण आगामी क्रियमाणपदवाच्य पापरूप कर्म चला जाता है। 'ज्ञानी के पुण्य कर्मों को सुहृद् ग्रहण करते हैं और पाप कर्मों को द्वेषी (द्वेष करने वाले) ग्रहण करते हैं” ऐसी ही श्रुति है। पुण्य-पाप जाने का अभिप्राय उनको ज्ञानीकृत पुण्य अथवा पापों के अनुरूप फल प्राप्त होता है। तथा आत्मज्ञानी संसार को पार कर यहाँ पर ही ब्रह्मानन्द को प्राप्त