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आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

१८ नष्ट हो जाते हैं। कमलपत्र पर निर्लिप्त जल की भाँति ज्ञानियों का आगामी कर्म के साथ सम्बन्ध नहीं होता ।।४२।। किञ्च ये ज्ञानिनं स्तुवन्ति भजन्त्यर्चयन्ति च, तान प्रति ज्ञानिकृतागामिपुण्यं गच्छति । ये च ज्ञानिनं निन्दन्ति द्विषन्ति दुःखप्रदानं कुर्वन्ति, तान्प्रति ज्ञानिकृतं सर्वमागामिक्रियमाणपदवाच्यं कर्म पापात्मकं गच्छति। तथा च श्रुतिः “सुहृदः पुण्यकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्यां गृहणन्तीति”। तथा चात्मवित् संसारं तीर्त्वा ब्रह्मानन्दमिहैव प्राप्नोति। “तरति शोकमात्मविदि”त्यादिश्रुतेः। तनुं त्यजतु वा काश्यां श्वपचस्य गृहेऽथवा। ज्ञानसम्प्राप्तिसमये मुक्तोऽसौ विगताशयः॥ इति स्मृतेश्च।४३।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्य- पादशिष्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ तत्त्वबोधः समाप्तः।। जो ज्ञानी की स्तुति करते हैं, सेवा करते हैं तथा पूजा करते हैं; ज्ञानियों का किया हुआ आगामी पुण्य कर्म उन्हीं के पास चला जाता है और जो ज्ञानी की निन्दा करते हैं, द्वेष करते हैं तथा दुःख देते हैं, उनके प्रति ज्ञानियों का किया हुआ सम्पूर्ण आगामी क्रियमाणपदवाच्य पापरूप कर्म चला जाता है। 'ज्ञानी के पुण्य कर्मों को सुहृद् ग्रहण करते हैं और पाप कर्मों को द्वेषी (द्वेष करने वाले) ग्रहण करते हैं” ऐसी ही श्रुति है। पुण्य-पाप जाने का अभिप्राय उनको ज्ञानीकृत पुण्य अथवा पापों के अनुरूप फल प्राप्त होता है। तथा आत्मज्ञानी संसार को पार कर यहाँ पर ही ब्रह्मानन्द को प्राप्त

१६ कर लेता है। "आत्मज्ञानी शोक की पार कर जाता है।" ऐसी श्रुति है। "ज्ञानी काशी में शरीर छोड़े अथवा चाण्डाल के घर में शरीर छोड़े; विशुद्ध आशय वाला वह तत्त्ववेत्ता तो ज्ञानसम्प्राप्तिकाल में ही मुक्त हो चुका है।" ऐसी स्मृति भी हैं। ।।४३।। ।। इति ॐ शम् ।। इस प्रकार कैलास पीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीमत्स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती जी द्वारा विरचित तत्त्वबोध व्याख्या सम्पन्न हुई।। समरीतिर्महातेजाः परब्रह्म सनातनः जयताज्जानकीनाथो वेदवेद्यो महामतिः॥

२० ।। श्रीमदभिनवचन्द्रेश्वरो विजयतेतराम् ।। ॐ श्रीशङ्करभगवत्पादाचार्यविरचितः आत्मबोधः जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य भगवान् ने उत्तम अधिकारियों के लिये प्रस्थानत्रयी (प्रस्थान-परमतत्त्व की प्राप्तिका साधन। गीता दशोपनिषद् तथा ब्रह्मसूत्र, ये तीन प्रस्थान हैं।) की रचना करके, उसको जानने में असमर्थ मन्दबुद्धि वालें जिज्ञासुओं पर कृपा करने के लिए सर्व वेदान्त सिद्धान्त रूपी धन संयुक्त 'आत्मबोध' नामक प्रकरण ग्रन्थ की रचना की प्रतिज्ञा ग्रन्थ के आदि में करते हैं- ॐ तपोभिः क्षीणपापानां शांतानां वीतरागिणाम् । मुमुक्षूणामपेक्ष्योऽयमात्मबोधो विधीयते ।।१।। व्याख्या- कृच्छ्रचान्द्रायण, नित्य और नैमित्तिक आदि कर्मों को शास्त्रों में 'तप' शब्द से कहा गया है। ऐसे तप का फलाभिसंधि से रहित होकर अनुष्ठान करने से जिनके पाप (अन्तःकरण के रागादि दोष) क्षीण हो गये हैं। अत एव जो शान्त हैं तथा जिनसे राग अर्थात् ऐहिक और पारलौकिक भोगों की आकाङ्क्षा निवृत्त हो गयी है, ऐसे संसार रूपी ग्रन्थि -भेदन में तत्पर साधनचतुष्टय संपन्न मुमुक्षुओं के लिए

२१ विधिमुखेन 'आत्मबोध' का प्रतिपादन किया जाता है ।।१।। शङ्का- जब तप, मन्त्र, कर्मयोग आदि अनेक साधन वर्तमान है तो मोक्ष के लिये प्रधान रूप से बोध को ही क्यों कहा जाता है। इस विषय में कहते हैं- बोधोऽन्यसाधनेभ्यो हि साक्षान्मोक्षैकसाधनम्। पाकस्य वह्निवज्ज्ञानं बिना मोक्षो न सिद्ध्यति।।२।। तप, मन्त्र, कर्मयोगादि साधन ज्ञान के माध्यम से परंपरया मोक्ष की सिद्धि करते हैं। जबकि ज्ञान मोक्ष का साक्षात् साधन है। ज्ञान तो उत्पत्ति मात्र से ही सम्पूर्ण अज्ञान को नाश करके मुमुक्षुओं को स्वाराज्य में अभिषिक्त कर देता है। इसलिए अन्य साधनों की अपेक्षा ज्ञान की प्रधानता कही गयी है। इस बात को दृष्टान्त द्वारा दृढ़ करते हैं कि जैसे काष्ठ, जल, पात्र आदि साधन होने पर भी वह्नि के बिना पाकक्रिया नहीं होती। ठीक उसी प्रकार ज्ञान के बिना मोक्ष की सिद्धि नहीं होती। ।।२।। विलक्षण शक्ति से युक्त होने से कोई कर्म ही अज्ञान को नष्ट कर देगा, अतः आत्मज्ञान से क्या लाभ? ऐसी आशङ्का का निराकरण करते हुए कहते हैं- अविरोधितया कर्म नाविद्यां विनिवर्तयेत्। विद्याऽविद्यां निहन्त्येव तेजस्तिमिरसङ्घवत्।।३।। कर्म और अज्ञान में विरोध न होने से अज्ञानात्मक कर्म, अन्तः- करणमलिनता रूपी काम क्रोध के कारण अज्ञान का नाश करने में समर्थ नहीं है। किन्तु ज्ञान प्रकाशस्वरूप होने से अज्ञान का नाश करने में समर्थ हैं। जैसे तेजःपुञ्ज अन्धकार का नाश करता है, ठीक वैसे ही ।।३।।

२२ प्रत्येक शरीर में भिन्न-भिन्न आत्मा उपलब्ध होता है, फिर आत्मा में कैवल्य (अद्वितीयत्व) कैसे है, ऐसी शङ्का होने पर उत्तर देते हैं- अविच्छिन्न इवाज्ञानात्तन्नाशे सति केवलः। स्वयं प्रकाशते ह्यात्मा मेघापायेऽंशुमानिव ।।४।। परिपूर्ण, अद्वितीय आत्मा में अज्ञान से परिकल्पित उत्तम-अधम शरीरों के तादात्म्याध्यास से परिच्छिन्नता भासती है। अत- अविवेक से ही भेद का भान हो रहा है, तात्त्विकदृष्टि से नहीं। आत्मानात्मविवेक से अज्ञान नष्ट होने पर अद्वितीय आत्मा प्रकाशमान होता है, जैसे मेघमण्डल के हटने पर आदित्य ।।४।। शङ्का- आत्मा में अभेदबुद्धि युक्तिसंगत नहीं हैं, वृत्त्यात्मक ज्ञान (अखण्डाकार वृत्ति) से भी आत्मा में भेद सिद्ध होता है, इस पर कहते हैं- अज्ञानकलुषं जीवं ज्ञानाभ्यासाद्धि निर्मलम्। कृत्वा ज्ञानं स्वयं नश्येज्जलं कतकरेणुवत् ।।५।। चिरकाल के अभ्यास से दृढ़ीभूत ज्ञान, अज्ञान नाश के द्वारा अज्ञान के कार्य अन्तःकरणादि का पूर्णरूपेण नाश करके कर्तृत्वादि आध्यासिक धर्मों का नाश करके जीव को निर्मल बनाकर अन्त में स्वयं भी नष्ट हो जाता है। वृत्ति अज्ञान का कार्य होने से, वृत्ति में प्रतिबिम्बित ज्ञान आत्माभासरूप होने से आत्मा में ही लीन हो जाता है। तब आत्मा प्रकाशित होता है। जैसे निर्मली बीज का चूर्ण (कतकरज) सम्पूर्ण जल को निर्मल बनाकर स्वयं भी नष्ट हो जाता है। ।।५।। अपरोक्ष रूप से अनुभव में आ रहा संसार अत्यन्त

२३ असत् (मिथ्या) कैसे हो सकता है। संसार को मिथ्या मानने पर प्रत्यक्ष प्रमाण से विरोध उपस्थित होगा। ऐसी आशंका होने पर स्वप्न-दृष्टान्त से संसार को मिथ्या सिद्ध करते हैं- संसारः स्वप्नतुल्यो हि रागद्वेषादिसंकुलः। स्वकाले सत्यवद्भाति प्रबोधे सत्यसद्‌भवेत् ।।६।। रागद्वेषादि से परिपूर्ण यह संसार अज्ञानदशा में सत्य के समान भासित होता है। श्रवणादि से आत्मज्ञान होने पर यह असत्य ही हो जाता है। जैसे निद्रा दोष के कारण मिथ्या स्वप्न सत्य के समान भासता है और जागरण काल में मिथ्या सिद्ध होता है, तद्वद् ।।६।। एक अन्य दृष्टान्त से जगत् के मिथ्यात्व को दृढ़ करते हैं- तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिकारजतं यथा। यावन्न ज्ञायते ब्रह्म सर्वाधिष्ठानमद्वयम् ।।७।। जैसे शुक्तिगत नीलपृष्ठ, त्रिकोण आदि विषयक विशेष ज्ञान जब तक नहीं होता तब तक शुक्ति में रजतज्ञान सत्य के समान मालूम पड़ता है। ठीक उसी प्रकार सर्वाधिष्ठान, सच्चिदानन्द स्वरूप, अद्वितीय ब्रह्म का ज्ञान जब तक नहीं होता तब तक जगद्रूप से परिणत संसार भी भ्रान्ति से सत्य जैसा ही लगता है। ।।७।। 'ब्रह्म में ही सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च माया से कल्पित है' इस तथ्य का प्रतिपादन करते हैं- सच्चिदात्मन्यनुस्यूते नित्ये विष्णौ प्रकल्पिताः। व्यक्तयो विविधाः सर्वा हाटके कटकादिवत् ।।८।। सच्चिदानन्द, नित्य, सर्वत्र, अनुगत, व्यापक परमात्मा जो कि सबका उपादान है, उसमें देव, तिर्यक्, मनुष्य, स्थावर तथा

२४ जङ्गम आदि सभी विशेष अभिव्यक्तियाँ, सुवर्ण में कटक, कुण्डल और मुकट आदि के समान कल्पित है। अर्थात् कल्पित की अधिष्ठानातिरिक्त सत्ता न होने से ब्रह्म से अभिन्न हैं। ।।८।। उपर्युक्त अर्थ को आकाश दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं- यथाऽऽकाशो हृषीकेशो नानोपाधिगतो विभुः। तद्भेदाद्भिन्नवद्भाति तन्नाशे सति केवलः।।९।। 'हृषीकम्' इन्द्रियों को कहते हैं। अतः मनः आदि सभी इन्द्रियों के प्रेरक या नियामक परमात्मा को 'हृषीकेश' कहा जाता है। ऐसे सर्वगत परमात्मा अपनी माया से परिकल्पित नाना प्रकार की उपाधियों में प्रतिबिम्बित होकर नाना (भिन्न) के समान भासित होते हैं। किन्तु ब्रह्मैक्यज्ञान होने पर, देहादि उपाधियों के नष्ट होने पर केवल एक आत्मस्वरूप से ही परिशिष्ट होकर भासते हैं। जैसे एक ही आकाश मठ, घट आदि उपाधियों में नाना (भिन्न) के समान भासित होता है और उपाधियों के विलय होने पर एक के समान ही भासता हैं, तद्वद् ।।६।। शङ्का- सभी देहों में तत्तद् जाति आदि से सम्बद्ध आत्मा नित्य मुक्त कैसे है? इस विषय में बताते हैं- नानोपाधिवशादेव जातिनामाश्रमादयः। आत्मन्यारोपितास्तोये रसवर्णादिभेदवत्।।१०।। नाना उपाधि संयुक्त आत्मा में जाति, वर्ण, नाम, रूप आदि आरोपित हैं अर्थात् मायाकल्पित हैं। वास्तव में सत्य नहीं है। ठीक उसी प्रकार जैसे स्वाभाविक रूप से मधुर जल कड़वा, तीखा, मधुर, लाल और पीले आदि द्रव्यों से संयुक्त होकर वैसा ही हो जाता है, स्वरूपतः नहीं ।।१०।।

२५ अब ज्ञानस्वरूप आत्मा की अविद्यापरिकल्पित तीन उपाधियों में से प्रथम उपाधि को कहते हैं- पञ्चीकृतमहाभूतसम्भवं कर्मसञ्चितम् । शरीरं सुखदुःखानां भोगायतनमुच्यते ।।११।। अपञ्चीकृत पाँच भूतों में प्रत्येक को दो भाग में विभक्त करके, उनमें से प्रत्येक के आधे भाग को पुनः चार टुकड़ों में विभक्त करके, अपने अर्ध भाग को छोड़कर अन्यों के अर्ध भाग में एक-एक टुकड़े को मिला देने से पञ्चीकरण होता है। इस प्रकार से पञ्चीकृत पञ्च पृथिवी आदि स्थूल महाभूतों से उत्पन्न होने वाला तथा प्रारब्ध कर्मों से सञ्चित स्थूल शरीर प्रत्यगात्मा के सुख-दुःख भोग (अनुभव) का आयतन (भोगस्थान) कहा जाता है। ।।११।। अब प्रत्यगात्मा के भोग साधन सूक्ष्मशरीर को बताते हैं- पञ्चप्राणमनोबुद्धिदशेन्द्रियसन्वितम् । अपञ्चीकृतभूतोत्थं सूक्ष्माङ्गं भोगसाधनम् ।।१२।। अञ्चीकृत पञ्च महाभूतों से उत्पन्न पञ्च प्राण, अन्तःकरण की संकल्पात्मिका वृत्ति रूपी मन, निश्चयात्मिका वृत्ति रूपी बुद्धि, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, इन सत्रह तत्त्वों से युक्त सूक्ष्म अङ्गों वाला लिङ्गशरीर प्रत्यगात्मा का भोग साधन कहा जाता है। ।।१२।। कार्योपाधि का कथन करके अब प्रत्यगात्मा की कारणोपाधि को कहते हैं- अनाद्यविद्याऽनिर्वाच्या कारणोपाधिरुच्यते। उपाधित्रितयादन्यमात्मानमवधारयेत्।।१३।।

२६ सद् असद् शब्दों से अनिर्वचनीय (कहने योग्य नहीं) अनादि अविद्या ही प्रत्यगात्मा की कारणोपाधि है। स्थूल और सूक्ष्म प्रपञ्च का कारण होने से उसे ऐसा कहा जाता है। अनृत, दुःख तथा जड़ से विलक्षण सत्, चिद् और आनन्द रूप से प्रकाशित होने से प्रत्यगात्मा कारणोपाधिवाला है। प्रति-प्रतिकूलेन अञ्चति प्रकाशते इति प्रत्यग्। प्रत्यगात्मा ही कारणोपाधिवाला है। इन तीनों ही उपाधियों के साक्षी आत्मा को उनसे विलक्षण ही जानना चाहिए ।।१३।। शङ्का- अन्नमय आदि पाँच कोशों में तादात्म्य भाव से स्थित आत्मा को नित्य मुक्त क्यों कहा जाता है? इस विषय में कहते हैं- पञ्चकोशादियोगेन तत्तन्मय इव स्थितः। शुद्धात्मा नीलवस्त्रादियोगेन स्फटिको यथा ।।१४।। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय, ये पाँच कोश हैं। इन पाँच कोशों में मिथ्या तादात्म्य करके आत्मा तत्तन्मय जैसे होकर स्थित है। जैसे शुद्ध स्फटिक नील, पीतादि वस्त्रों के सम्बन्ध से नीलादिरूप विशिष्ट भासित होता है। इसी प्रकार शुद्ध आत्मा पाँच कोशों और उनके क्षुधा-पिपासा आदि धर्मों से तादात्म्य करके कोशादि से विशिष्ट जानने में आता हैं। वस्तुतः आत्मा में कोई लेप नहीं है। ।।१४।। आत्मस्वरूप ज्ञान के लिए पञ्च कोशों से आत्मा के विवेचन का प्रकार बताते हैं- वपुस्तुषादिभिः कोशैर्युक्तं युक्त्यवघाततः। आत्मानमान्तरं शुद्धं विविच्यात्तण्डुलं यथा।।१५।।

२७ जैसे भूसी आदि (तुषादि) युक्त चावल को अवघात (कुटाई) से पृथक् करके शुद्ध कर लिया जाता है। वैसे ही अन्नमयादि पाँच कोशो से आवृत आत्मा को युक्तियों से विविक्त करके जान लेना चाहिए। निम्नलिखित युक्तियों से (अनुमान से) आत्मा, स्थूल और सूक्ष्म शरीरों से भिन्न सिद्ध होता है। स्थूलदेहो नात्मा कार्यभूतत्वात् घटवत्। सूक्ष्मदेहोऽपि अनात्मा देहत्वात् स्थूलदेहवत्। इस प्रकार अनुमानरूपी युक्तियों से आत्मा को पञ्च कोशों से पृथक् जान लेना चाहिए ।।१५।। शंका- आत्मा सर्वगत है तो सर्वत्र दिखाई क्यों नहीं पड़ता? समाधन करते हैं- सदा सर्वगतोऽप्यात्मा न सर्वत्रावभासते। बुद्धावेवावभासेत स्वच्छेषु प्रतिबिम्बवत्।।१६।। आत्मा सदा ही सर्वत्र विराजमान होने पर भी जड़ बाह्येन्द्रियों के द्वारा प्रकाशित नहीं होता। रागादि से रहित बुद्धि में ही उसका प्रकाशन होता है, सर्वत्र नहीं। जैसे प्रतिबिम्ब स्वच्छ दर्पण आदि में ही दिखाई देता है, सर्वत्र नहीं। ठीक उसी तरह ।।१६।। अब राजा के दृष्टान्त से देह में स्थित आत्मा की उदासीनता को दिखाते हैं- देहेन्द्रियमनोबुद्धिप्रकृतिभ्यो विलक्षणम्। तद्वृत्तिसाक्षिणं विद्यादात्मानं राजवत्सदा।।१७।। जड़स्वरूप परिणामस्वरूप तथा दृश्यस्वरूप देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और प्रकृति से आत्मा को विलक्षण और अन्तःकरणवृत्तियों का साक्षी जानना चाहिए। जैसे राजा अपने नगर में स्थित होकर

२८ मन्त्री आदि को साक्षी रूप से देखता हुआ अवस्थित होता है, उसी प्रकार ।।१७।। 'आत्मा अविकारी है' यह कहना ठीक नहीं क्योंकि आत्मा सर्वदा व्यापार करता हुआ मालूम पड़ता है, ऐसी शंका का समाधान करते हैं- व्यापृतेष्विन्द्रियेष्वात्मा व्यापारीवाविवेकिनाम्। दृश्यतेऽभ्रेषु धावत्सु धावन्निव यथा शशी।।१८।। शास्त्र और आचार्य के उपदेश से रहित अविवेकी पुरुषों को आत्मा, इन्द्रियों के व्यापार युक्त होने पर, व्यापारविशिष्ट मालूम पड़ता है। किन्तु तत्त्वज्ञानी ऐसा नहीं देखते। जैसे वायु के थपेड़ों से मेघ मण्डल में गति होने पर लौकिक पुरुषों को चन्द्रमा भी गतिशील दिखाई पड़ता है। वास्तव में चन्द्रमा में गति नहीं होती। इसी तरह आत्मा के विषय में जानना चाहिए। ।।१८।। शंका- देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि भी आत्मा के समान चेतन जानने में क्यों आ रहे है? समाधान करते हैं- आत्मचैतन्यमाश्रित्य देहेन्द्रियमनोधियः। स्वकीयार्थेषु वर्तन्ते सूर्यालोकं यथा जनाः।।१९।। सत्, चित्, आनन्द स्वरूप आत्मा की चेतनता के आश्रित होकर देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त होते हैं। जैसे सभी प्राणी सूर्य प्रकाश का आश्रय लेकर लौकिक व्यवहारों का निर्वहन करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि स्वाभाविक चैतन्य आत्मा में है, देह, इन्द्रिय आदि तो जड़ है। ।।१९।। शङ्का- 'मैं उत्पन्न हुआ हूँ' 'मैं बाल्य, कौमार और यौवन आदि अवस्थाओं का अनुभव करने वाला हूँ' 'मैं देखता हूँ'

अध्यस्यन्त्यविवेकेन गगने नीलिमादिवत्।।२०।।

२६ इत्यादि प्रतीतियों से निरन्तर अनुभव में आ रहा आत्मा को अविकारी कैसे कहा जाता है? बताते हैं- देहेन्द्रियगुणान्कर्माण्यामले सच्चिदात्मनि। अध्यस्यन्त्यविवेकेन गगने नीलिमादिवत्।।२०।। देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि के धर्मों को, सत्त्वादि गुणों का और कर्मेन्द्रियों के व्यापारों को अविवेक से और अत्यन्त सन्निधि रूपी दोष से मिथ्या तादात्म्य के कारण निर्मल, असंग, सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा में आरोपित किये जाते हैं। जैसे गगन में नीलिमा का भान होता है, किन्तु वह गगन का धर्म नहीं है। इसी प्रकार उत्पत्ति अवस्था आदि धर्म देहादि में हैं, आत्मा में संभव नहीं हैं। ।।२०।। कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि धर्म आत्मा में निरन्तर अनुभव में आ रहे हैं, अतः उसका वारण नहीं किया जा सकता है। ऐसी शङ्का होने पर उसका समाधान अगले श्लोक से करते हैं- अज्ञानान्मानसोपाधेः कर्तृत्वादीनि चात्मनि। कल्प्यन्तेऽम्बुगते चन्द्रे चलनादि यथाऽम्भसः।।२१।। जैसे जल मे होने वाले कम्पन्न आदि धर्म अविवेक से जल में प्रतिबिम्बित चन्द्र में आरोपित किये जाते है। उसी प्रकार अन्तःकरण उपाधि के कर्तृत्व आदि धर्म अज्ञान से शुद्ध आत्मा में आरोपित किये जाते हैं ।।२१।। नैयायिक और वैशेषिक मतावलंबी इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख आदि को आत्मा के धर्म मानते हैं। अतः उनका निराकरण अगले श्लोक में करते हैं- रागेच्छासुखदुःखादि बुद्धौ सत्यां प्रवर्तते।

३० सुषुप्तौ नास्ति तन्नाशे तस्माद्बुद्धेस्तु नात्मनः॥२२॥ राग, इच्छा, सुख, दुःख, धर्म, अधर्म आदि बुद्धि के धर्म है। कैसे मालूम पड़ा ? अन्वय व्यतिरेक रूपी युक्ति से यही सिद्ध होता है। जाग्रत् और स्वप्नावस्था में बुद्धि के होने पर ही इन धर्मों का भान होता है। परन्तु सुषुप्ति अवस्था में बुद्धि के, कारण (अज्ञान) में लीन होने पर इन धर्मों का (भी) भान नहीं होता। अतः सिद्ध होता है कि इच्छादि बुद्धि के धर्म है, आत्मा के नहीं ।।२२।। अब अगले श्लोक में आत्मा के स्वभाव का कथन करते हैं- प्रकाशोऽर्कस्य तोयस्य शैत्यमग्नेर्यथोष्णता। स्वभावः सच्चिदानन्दनित्यनिर्मलतात्मनः।।२३।। जैसे सूर्य का स्वभाव प्रकाश, जल का शीतलता तथा अग्नि की उष्णता है। उसी प्रकार आत्मा का स्वभाव सत्, चिद्, आनन्द और नित्यनिर्मलता है ।।२३।। यदि आत्मा विकार रहित है तो मैं 'जानता हूँ' यह ज्ञान कैसे होता है, ऐसी अपेक्षा होने पर उत्तर देते हैं- आत्मनः सच्चिदंशश्च बुद्धेर्वृत्तिरिति द्वयम्। संयोज्य चाविवेकेन जानामीति प्रवर्तते।।२४।। आत्मा का सत् चिद् अंश और बुद्धि की वृत्ति, इन दोनों को अज्ञान से मिलाकर मैं 'जानता हूँ' इस प्रकार साभास अंहकार वृत्ति प्रवृत्त होती है। असङ्ग आत्मा का किसी के साथ कोई संयोग नहीं है। वस्तुतः न तो आत्मा का सत् चिद् अंश है। न ही बुद्धि के साथ उसका संबंध संभव है ।।२४।।

३१ आत्मा में विकाराभाव को स्पष्ट करते हैं- आत्मनो विक्रिया नास्ति बुद्धेर्बोधो न जात्विति। जीवः सर्वमलं ज्ञात्वा ज्ञाता द्रष्टेति मुह्यति॥२५॥ आत्मा स्वभाव से ही विकार शून्य है। बुद्धि में ज्ञान होने की शङ्का भी नहीं हो सकती और आत्मा में कभी विकार नहीं हो सकता। फिर भी जीव शब्द वाच्य साभास अहंकार देह, इन्द्रिय आदि में अत्यन्त अध्यास करके 'मैं ज्ञाता, कर्ता, भोक्ता, द्रष्टा, पैदा हुआ तथा मरने वाला हूँ' इस प्रकार मानता है। जिस प्रकार लौहपिण्ड में अग्नि का अध्यास होता है, वैसे ही परस्पर धर्मों के अध्यास से मोहित होता है ॥२५॥ आत्मा अविवेक से अन्य के धर्मों को आरोपित करके भययुक्त होता है, इसे कहते हैं- रज्जुसर्पवदात्मानं जीवं ज्ञात्वा भयं वहेत्। नाहं जीवः परात्मेति ज्ञातश्चेन्निर्भयो भवेत्॥२६॥ जैसे जीव रज्जु में सर्प का आरोप करके भय, कम्पन आदि से युक्त होता है। इसी प्रकार अपने सत्, चित्, आनन्द स्वरूपता को न जानकर, अपने को जीव मान करके सहस्रों सांसारिक दुःखों से पीड़ित होता है। जब शास्त्र और आचार्य के उपदेश से उत्पन्न विवेकदृष्टि से अखण्ड एकरूप आत्मा को जानता है, तब भयरहित हो जाता है। ॥२६॥ 'आत्मा सबका प्रकाशक है' इसे स्पष्ट करते हैं- आत्मावभासयत्येको बुद्ध्यादीनीन्द्रियाणि च। दीपो घटादिवत्स्वात्मा जडैस्तैर्नावभास्यते॥२७॥ आत्मा अकेले ही सम्पूर्ण बुद्धि आदि इन्द्रियों को प्रकाशित

३२ करता है। किन्तु उन बुद्धि आदि से प्रकाशित नहीं होता। जैसे एक दीपक घटादि सभी संनिहित पदार्थों को प्रकाशित कर देता है, उनसे प्रकाशित नहीं होता, उसी तरह ।।२७।। शङ्का - आत्मा अपने प्रकाश के लिए बुद्धि आदि की अपेक्षा रखता है, ऐसा स्वीकार करना चाहिए। उत्तर देते हैं- स्वबोधे नान्यबोधेच्छा बोधरूपतयात्मनः। न दीपस्यान्यदीपेच्छा यथा स्वात्मप्रकाशने।।२८।। आत्मा ज्ञानस्वरूप होने से नित्य प्रकाशित होते रहता है। अपने बोध के लिए अन्य ज्ञान की अपेक्षा नहीं रखता है क्योंकि वह अनुभवस्वरूप है। जैसे दीपक अपने प्रकाशन के लिए अन्य दीपक की अपेक्षा नहीं रखता वैसे ही ।।२८।। यदि बुद्ध्यादि से आत्मा जानने योग्य नहीं है तो आत्मज्ञान का अन्य उपाय बताना चाहिए। वह उपाय क्या है? इसे कहते हैं- निषिध्य निखिलोपाधीन्नेति नेतीति वाक्यतः। विद्यादैक्यं महावाक्यैर्जीवात्मपरमात्मनोः ।।२९।। 'अथात आदेशो नेति नेतीति' इन वेदान्त वाक्यों से तत्त्वं पदार्थगत सम्पूर्ण सर्वज्ञत्व, किञ्चिज्ज्ञत्व, नियन्तृत्व, नियम्यत्व आदि उपाधियों का निषेध कर देने से अर्थात् उन उपाधियों को अनात्मा जानकर निराकरण करके 'तत्त्वमसि' 'अयमात्मा ब्रह्म' 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि वाक्यों के द्वारा भागत्याग लक्षणा से जीव ब्रह्म की एकता को जानना चाहिए। यही आत्मज्ञान का सर्वोत्तम उपाय है ।।२६।।

३३ आत्मस्वरूप को जानने में अनात्म पदार्थों का निषेध, न करने से क्या क्षति हो सकती है? वास्तव में विचार दृष्टि से देखा जाए तो अनात्म पदार्थों का निरास न करने पर आत्मा जाना ही नहीं जा सकता। जैसे 'यह सर्प है' इस प्रकार रज्जु में भ्रान्ति से आरोपित सर्प का निषेध किए बिना रज्जुज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता। इसी प्रकार अनात्म पदार्थों का निषेध करने पर ही आत्मा ज्ञातव्य है। इस आशय को अगले श्लोक से स्पष्ट करते हैं- आविद्यकं शरीरादि दृश्यं बुद्बुदवत् क्षरम्। एतद्विलक्षणं विद्यादहं ब्रह्मेति निर्मलम्।।३०।। देहेन्द्रियादि सम्पूर्ण दृश्य समुदाय अविद्याका कार्य है, दृश्य होने से, पानी के बुलबुले के समान। यह विनाशी भी है। इससे विलक्षण उपाधियों के संसर्ग से रहित, निर्मल, नित्य, एक, सच्चिदानन्द ब्रह्म मैं ही हूँ, इस प्रकार अनुभव करें। ऐसा जानने से ही कृतकृत्य होगा ।।३०।। एवं उपर्युक्त रीति से अद्वितीय, आनन्दस्वरूप आत्मा को महावाक्यार्थ ज्ञान से अपरोक्ष रूप से जानकर, अपने अनुभव के आधार पर विशुद्ध अन्तःकरण में आत्मविषयक मनन के स्वरूप को पाँच श्लोकों से कहते हैं- देहान्यत्वान्न मे जन्मजराकार्श्यलयादयः। शब्दादिविषयैः सङ्गो निरिन्द्रियतया न च।।३१।। दृश्य, जड़ आदि स्वभाव वाले स्थूल शरीर से भिन्न होने से जन्म, बुढ़ापा, कृशता (पतला होना) और लय (मृत्यु) आदि विकार मुझमें नहीं है। इन्द्रियों से सम्बन्ध न होने से मुझमें शब्दादि विषयों का सङ्ग नहीं, अत एव मुझमें विषय-भोग नहीं हैं ।।३१।।

३४ अमनस्त्वान्न मे दुःखरागद्वेषभयादयः । 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र' इत्यादिश्रुतिशासनात् ।।३२।। आत्मस्वरूप मुझमें मन का अभाव होने से दुःख, राग, द्वेष, भय आदि का अभाव है। आत्मा में इन्द्रिय, प्राण और मन का अभाव कैसे हैं? ऐसी आशङ्का होने पर प्रमाण रूप से श्रुति को प्रस्तुत करते हैं। मुण्डकोपनिषद् की श्रुति कहती है, "अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः।" (मुण्ड २/१/२) ।।३२।। अब अगले तीन श्लोकों से गुरु की प्रसन्नता से अनुभूत ज्ञान को प्रकट करते हैं- निर्गुणो निष्क्रियो नित्यो निर्विकल्पो निरञ्जनः । निर्विकारो निराकारो नित्यमुक्तोऽस्मि निर्मलः।।३३।। मैं बुद्ध्यादि का अभाव होने से निर्गुण, इन्द्रियों का अभाव होने से निष्क्रिय, अविद्या के कार्य से रहित होने से नित्य, मन का अभाव होने से निर्विल्प, अज्ञान का अभाव होने से निरञ्जन, शरीर का अभाव होने से विकाररहित, निरवयव होने से निराकार, नित्यमुक्त तथा निर्मल हूँ ।।३३।। अब अवशिष्ट स्वरूप को अग्रिम श्लोक से कहते हैं- अहमाकाशवत्सर्वबहिरन्तर्गतोऽच्युतः । सदा सर्वसमः शुद्धो निःसङ्गो निर्मलोऽचलः ।।३४।। जैसे आकाश सर्वत्र व्याप्त है, उसी तरह मैं सम्पूर्ण दृश्य समुदाय के बाहर-भीतर व्याप्त, किसी भी प्रकार की च्युति (स्वरूप नाश) से रहित, विषम वस्तुओं में भी समान रूप से स्थित, शुद्ध (निर्लिप्त) तथा पूर्ण होने से अचल हूँ ।।३४।।

पूर्वोक्त श्लोक वर्णित मनन का चिरकाल अभ्यास

३५ पूर्वोक्त श्लोक वर्णित मनन का चिरकाल अभ्यास करने पर पुरुषार्थ की सिद्धि अवश्यम्भावी होती है, इसे दिखाते हैं- एवं निरन्तराभ्यस्ता ब्रह्मैवास्मीति वासना। हरत्यविद्याविक्षेपान् रोगानिव रसायनम्।।३५।। इस प्रकार से निरन्तर 'मैं ब्रह्म हूँ' इसका अभ्यास करने से तज्जन्य दृढ़ संस्कार अविद्याकृत चित्त विक्षेपों को पूरी तरह से नाश कर देता है। जैसे चिरकालतक सेवन की गयी उपयुक्त औषधि रोग को जड़ से निकाल देती है, ठीक वैसे ही ।।३५।। अब जीव-ब्रह्म की एकता को दृढ़ करने के लिए पुनः कथन करते हैं- नित्यशुद्धविमुक्तैकमखण्डानन्दमद्वयम्। सत्यं ज्ञानमनन्तं यत् परब्रह्माहमेव तत्।।३६।। 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियों में जिस नित्य, शुद्ध, विमुक्त, एक, अखण्ड, आनन्दस्वरूप, अद्वितीय परब्रह्म का कथन किया गया है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ। ।।३६।। अब ब्रह्मानुसन्धान संबन्धित कुछ अवश्य पालनीय नियमों को कहते हैं- विविक्तदेश आसीनो विरागो विजितेन्द्रियः। भावयेदेकमात्मानं तमनन्तमनन्यधीः ।।३७।। स्त्री, जन आदि के विक्षेप से रहित विविक्त देश में वैराग्य और इन्द्रियनिग्रह पूर्वक स्थित होकर अनन्यचित्त से उस अनन्त आत्मा का प्रत्यग् रूप से चिन्तन करें। अर्थात् ब्रह्म में ही बुद्धि को स्थिर करे।।३७।।

३६ दृश्य प्रपञ्च के विद्यमान रहते एकत्वभावना कैसे संभव है? इस विषय में बताते हैं- आत्मन्येवाखिलं दृश्यं प्रविलाप्य धिया सुधीः। भावयेदेकमात्मानं निर्मलाकाशवत्सदा ॥३८॥ बुद्धिमान् साधक शुद्ध बुद्धि से आत्मा में ही सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च को लीन करके अर्थात् प्रपञ्चमिथ्यात्व का दृढ़ निश्चय करके, द्वैत का अभाव होने से निर्मल आकाश के समान एक आत्मा की ही भावना करें।।३८।। अब ज्ञानी महापुरुष की स्थिति का वर्णन करते हैं- नामवर्णादिकं सर्वं विहाय परमार्थवित्। परिपूर्णचिदानन्दस्वरूपेणावतिष्ठते।।३९।। परमात्मतत्त्व ज्ञानी महापुरुष सम्पूर्ण नाम, रूप, वर्ण आदि युक्त जगत् का परित्याग करके देश काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित चिदानन्द स्वरूप से अवस्थित हो जाता है ।।३९।। शङ्का- प्रमातृत्व आदि त्रिपुटी (प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय) का ज्ञान जब तक है, तब तक एकत्वभावना कैसे संभव है? समाधान करते हैं- ज्ञातृज्ञानज्ञेयभेदः परात्मनि न विद्यते। चिदानन्दैकरूपत्वादीप्यते स्वयमेव हि।।४०।। ज्ञातृ, ज्ञान, ज्ञेय भेद रूपी त्रिपुटी परमात्मा में बिल्कुल नहीं है। भेद कल्पित आत्मा में ही भासित होता है। आत्मा ज्ञान और आनन्दरूप होने से स्वयं ही प्रकाशित होता है ।।४०।।

३७ इस प्रकार विशुद्ध आत्म वस्तु के ज्ञान से प्रत्यक्ष फल बताते हैं। एवमात्मारणौ ध्यानमथने सततं कृते। उदिताऽवगतिज्वाला सर्वाज्ञानेन्धनं दहेत्।।४१।। याज्ञिक क्रियाओं के आरम्भ में दो अरणियों (अरहर आदि काष्ठनिर्मित) के मन्थन से अग्नि प्रकट की जाती है, जो डाली गयी सभी आहुतियों को जलाकर भस्म कर देती है। इसी प्रकार दाष्ट्रान्त में, विशुद्ध अन्तःकरण रूपी अरणि में मन उत्तर अरणि के समान है, ध्यान के द्वारा दोनों का नित्य निरन्तर मन्थन करने पर वहाँ उत्पन्न ज्ञानाग्नि की ज्वाला, सम्पूर्ण अज्ञानरूपी ईंधन को अर्थात् कार्य के सहित मूलाज्ञान को सम्पूर्ण रूप से जलाकर भस्मसात् कर देती है। इससे तितिक्षु मुमुक्षु स्वाराज्य में अभिषिक्त होकर कृतकृत्य हो जाता है ॥४१॥ जीव-ब्रह्म के एकत्व के दृढ़ ज्ञान से, अविद्या से परिकल्पित अन्धकार के सम्पूर्ण रूप से नष्ट होने पर परमात्मा स्वयं आविर्भूत हो जाता है। इसे अगले श्लोक से कहते हैं- अरुणेनेव बोधेन पूर्वसन्तमसे हृते। तत आविर्भवेदात्मा स्वयमेवांशुमानिव।।४२।। जैसे सूर्योदय के पहले सूर्यप्रकाश से अन्धकार का नाश होने पर सूर्य प्रकट हो जाता है। उसी तरह ज्ञान से अज्ञानान्धकार का नाश होने पर आत्मा का आविर्भाव हो जाता है ॥४२॥ आत्मा परोक्ष स्वभाव वाला होने से सर्वदा अप्राप्त ही है। वह प्राप्त कब होगा? इसे बताते हैं-