आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६ इत्यादि प्रतीतियों से निरन्तर अनुभव में आ रहा आत्मा को अविकारी कैसे कहा जाता है? बताते हैं- देहेन्द्रियगुणान्कर्माण्यामले सच्चिदात्मनि। अध्यस्यन्त्यविवेकेन गगने नीलिमादिवत्।।२०।। देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि के धर्मों को, सत्त्वादि गुणों का और कर्मेन्द्रियों के व्यापारों को अविवेक से और अत्यन्त सन्निधि रूपी दोष से मिथ्या तादात्म्य के कारण निर्मल, असंग, सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा में आरोपित किये जाते हैं। जैसे गगन में नीलिमा का भान होता है, किन्तु वह गगन का धर्म नहीं है। इसी प्रकार उत्पत्ति अवस्था आदि धर्म देहादि में हैं, आत्मा में संभव नहीं हैं। ।।२०।। कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि धर्म आत्मा में निरन्तर अनुभव में आ रहे हैं, अतः उसका वारण नहीं किया जा सकता है। ऐसी शङ्का होने पर उसका समाधान अगले श्लोक से करते हैं- अज्ञानान्मानसोपाधेः कर्तृत्वादीनि चात्मनि। कल्प्यन्तेऽम्बुगते चन्द्रे चलनादि यथाऽम्भसः।।२१।। जैसे जल मे होने वाले कम्पन्न आदि धर्म अविवेक से जल में प्रतिबिम्बित चन्द्र में आरोपित किये जाते है। उसी प्रकार अन्तःकरण उपाधि के कर्तृत्व आदि धर्म अज्ञान से शुद्ध आत्मा में आरोपित किये जाते हैं ।।२१।। नैयायिक और वैशेषिक मतावलंबी इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख आदि को आत्मा के धर्म मानते हैं। अतः उनका निराकरण अगले श्लोक में करते हैं- रागेच्छासुखदुःखादि बुद्धौ सत्यां प्रवर्तते।