आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८ मन्त्री आदि को साक्षी रूप से देखता हुआ अवस्थित होता है, उसी प्रकार ।।१७।। 'आत्मा अविकारी है' यह कहना ठीक नहीं क्योंकि आत्मा सर्वदा व्यापार करता हुआ मालूम पड़ता है, ऐसी शंका का समाधान करते हैं- व्यापृतेष्विन्द्रियेष्वात्मा व्यापारीवाविवेकिनाम्। दृश्यतेऽभ्रेषु धावत्सु धावन्निव यथा शशी।।१८।। शास्त्र और आचार्य के उपदेश से रहित अविवेकी पुरुषों को आत्मा, इन्द्रियों के व्यापार युक्त होने पर, व्यापारविशिष्ट मालूम पड़ता है। किन्तु तत्त्वज्ञानी ऐसा नहीं देखते। जैसे वायु के थपेड़ों से मेघ मण्डल में गति होने पर लौकिक पुरुषों को चन्द्रमा भी गतिशील दिखाई पड़ता है। वास्तव में चन्द्रमा में गति नहीं होती। इसी तरह आत्मा के विषय में जानना चाहिए। ।।१८।। शंका- देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि भी आत्मा के समान चेतन जानने में क्यों आ रहे है? समाधान करते हैं- आत्मचैतन्यमाश्रित्य देहेन्द्रियमनोधियः। स्वकीयार्थेषु वर्तन्ते सूर्यालोकं यथा जनाः।।१९।। सत्, चित्, आनन्द स्वरूप आत्मा की चेतनता के आश्रित होकर देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त होते हैं। जैसे सभी प्राणी सूर्य प्रकाश का आश्रय लेकर लौकिक व्यवहारों का निर्वहन करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि स्वाभाविक चैतन्य आत्मा में है, देह, इन्द्रिय आदि तो जड़ है। ।।१९।। शङ्का- 'मैं उत्पन्न हुआ हूँ' 'मैं बाल्य, कौमार और यौवन आदि अवस्थाओं का अनुभव करने वाला हूँ' 'मैं देखता हूँ'