भारतकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

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२७ जैसे भूसी आदि (तुषादि) युक्त चावल को अवघात (कुटाई) से पृथक् करके शुद्ध कर लिया जाता है। वैसे ही अन्नमयादि पाँच कोशो से आवृत आत्मा को युक्तियों से विविक्त करके जान लेना चाहिए। निम्नलिखित युक्तियों से (अनुमान से) आत्मा, स्थूल और सूक्ष्म शरीरों से भिन्न सिद्ध होता है। स्थूलदेहो नात्मा कार्यभूतत्वात् घटवत्। सूक्ष्मदेहोऽपि अनात्मा देहत्वात् स्थूलदेहवत्। इस प्रकार अनुमानरूपी युक्तियों से आत्मा को पञ्च कोशों से पृथक् जान लेना चाहिए ।।१५।। शंका- आत्मा सर्वगत है तो सर्वत्र दिखाई क्यों नहीं पड़ता? समाधन करते हैं- सदा सर्वगतोऽप्यात्मा न सर्वत्रावभासते। बुद्धावेवावभासेत स्वच्छेषु प्रतिबिम्बवत्।।१६।। आत्मा सदा ही सर्वत्र विराजमान होने पर भी जड़ बाह्येन्द्रियों के द्वारा प्रकाशित नहीं होता। रागादि से रहित बुद्धि में ही उसका प्रकाशन होता है, सर्वत्र नहीं। जैसे प्रतिबिम्ब स्वच्छ दर्पण आदि में ही दिखाई देता है, सर्वत्र नहीं। ठीक उसी तरह ।।१६।। अब राजा के दृष्टान्त से देह में स्थित आत्मा की उदासीनता को दिखाते हैं- देहेन्द्रियमनोबुद्धिप्रकृतिभ्यो विलक्षणम्। तद्वृत्तिसाक्षिणं विद्यादात्मानं राजवत्सदा।।१७।। जड़स्वरूप परिणामस्वरूप तथा दृश्यस्वरूप देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और प्रकृति से आत्मा को विलक्षण और अन्तःकरणवृत्तियों का साक्षी जानना चाहिए। जैसे राजा अपने नगर में स्थित होकर