आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६ सद् असद् शब्दों से अनिर्वचनीय (कहने योग्य नहीं) अनादि अविद्या ही प्रत्यगात्मा की कारणोपाधि है। स्थूल और सूक्ष्म प्रपञ्च का कारण होने से उसे ऐसा कहा जाता है। अनृत, दुःख तथा जड़ से विलक्षण सत्, चिद् और आनन्द रूप से प्रकाशित होने से प्रत्यगात्मा कारणोपाधिवाला है। प्रति-प्रतिकूलेन अञ्चति प्रकाशते इति प्रत्यग्। प्रत्यगात्मा ही कारणोपाधिवाला है। इन तीनों ही उपाधियों के साक्षी आत्मा को उनसे विलक्षण ही जानना चाहिए ।।१३।। शङ्का- अन्नमय आदि पाँच कोशों में तादात्म्य भाव से स्थित आत्मा को नित्य मुक्त क्यों कहा जाता है? इस विषय में कहते हैं- पञ्चकोशादियोगेन तत्तन्मय इव स्थितः। शुद्धात्मा नीलवस्त्रादियोगेन स्फटिको यथा ।।१४।। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय, ये पाँच कोश हैं। इन पाँच कोशों में मिथ्या तादात्म्य करके आत्मा तत्तन्मय जैसे होकर स्थित है। जैसे शुद्ध स्फटिक नील, पीतादि वस्त्रों के सम्बन्ध से नीलादिरूप विशिष्ट भासित होता है। इसी प्रकार शुद्ध आत्मा पाँच कोशों और उनके क्षुधा-पिपासा आदि धर्मों से तादात्म्य करके कोशादि से विशिष्ट जानने में आता हैं। वस्तुतः आत्मा में कोई लेप नहीं है। ।।१४।। आत्मस्वरूप ज्ञान के लिए पञ्च कोशों से आत्मा के विवेचन का प्रकार बताते हैं- वपुस्तुषादिभिः कोशैर्युक्तं युक्त्यवघाततः। आत्मानमान्तरं शुद्धं विविच्यात्तण्डुलं यथा।।१५।।