आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५ अब ज्ञानस्वरूप आत्मा की अविद्यापरिकल्पित तीन उपाधियों में से प्रथम उपाधि को कहते हैं- पञ्चीकृतमहाभूतसम्भवं कर्मसञ्चितम् । शरीरं सुखदुःखानां भोगायतनमुच्यते ।।११।। अपञ्चीकृत पाँच भूतों में प्रत्येक को दो भाग में विभक्त करके, उनमें से प्रत्येक के आधे भाग को पुनः चार टुकड़ों में विभक्त करके, अपने अर्ध भाग को छोड़कर अन्यों के अर्ध भाग में एक-एक टुकड़े को मिला देने से पञ्चीकरण होता है। इस प्रकार से पञ्चीकृत पञ्च पृथिवी आदि स्थूल महाभूतों से उत्पन्न होने वाला तथा प्रारब्ध कर्मों से सञ्चित स्थूल शरीर प्रत्यगात्मा के सुख-दुःख भोग (अनुभव) का आयतन (भोगस्थान) कहा जाता है। ।।११।। अब प्रत्यगात्मा के भोग साधन सूक्ष्मशरीर को बताते हैं- पञ्चप्राणमनोबुद्धिदशेन्द्रियसन्वितम् । अपञ्चीकृतभूतोत्थं सूक्ष्माङ्गं भोगसाधनम् ।।१२।। अञ्चीकृत पञ्च महाभूतों से उत्पन्न पञ्च प्राण, अन्तःकरण की संकल्पात्मिका वृत्ति रूपी मन, निश्चयात्मिका वृत्ति रूपी बुद्धि, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, इन सत्रह तत्त्वों से युक्त सूक्ष्म अङ्गों वाला लिङ्गशरीर प्रत्यगात्मा का भोग साधन कहा जाता है। ।।१२।। कार्योपाधि का कथन करके अब प्रत्यगात्मा की कारणोपाधि को कहते हैं- अनाद्यविद्याऽनिर्वाच्या कारणोपाधिरुच्यते। उपाधित्रितयादन्यमात्मानमवधारयेत्।।१३।।