आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३० सुषुप्तौ नास्ति तन्नाशे तस्माद्बुद्धेस्तु नात्मनः॥२२॥ राग, इच्छा, सुख, दुःख, धर्म, अधर्म आदि बुद्धि के धर्म है। कैसे मालूम पड़ा ? अन्वय व्यतिरेक रूपी युक्ति से यही सिद्ध होता है। जाग्रत् और स्वप्नावस्था में बुद्धि के होने पर ही इन धर्मों का भान होता है। परन्तु सुषुप्ति अवस्था में बुद्धि के, कारण (अज्ञान) में लीन होने पर इन धर्मों का (भी) भान नहीं होता। अतः सिद्ध होता है कि इच्छादि बुद्धि के धर्म है, आत्मा के नहीं ।।२२।। अब अगले श्लोक में आत्मा के स्वभाव का कथन करते हैं- प्रकाशोऽर्कस्य तोयस्य शैत्यमग्नेर्यथोष्णता। स्वभावः सच्चिदानन्दनित्यनिर्मलतात्मनः।।२३।। जैसे सूर्य का स्वभाव प्रकाश, जल का शीतलता तथा अग्नि की उष्णता है। उसी प्रकार आत्मा का स्वभाव सत्, चिद्, आनन्द और नित्यनिर्मलता है ।।२३।। यदि आत्मा विकार रहित है तो मैं 'जानता हूँ' यह ज्ञान कैसे होता है, ऐसी अपेक्षा होने पर उत्तर देते हैं- आत्मनः सच्चिदंशश्च बुद्धेर्वृत्तिरिति द्वयम्। संयोज्य चाविवेकेन जानामीति प्रवर्तते।।२४।। आत्मा का सत् चिद् अंश और बुद्धि की वृत्ति, इन दोनों को अज्ञान से मिलाकर मैं 'जानता हूँ' इस प्रकार साभास अंहकार वृत्ति प्रवृत्त होती है। असङ्ग आत्मा का किसी के साथ कोई संयोग नहीं है। वस्तुतः न तो आत्मा का सत् चिद् अंश है। न ही बुद्धि के साथ उसका संबंध संभव है ।।२४।।