भारतकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

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३७ इस प्रकार विशुद्ध आत्म वस्तु के ज्ञान से प्रत्यक्ष फल बताते हैं। एवमात्मारणौ ध्यानमथने सततं कृते। उदिताऽवगतिज्वाला सर्वाज्ञानेन्धनं दहेत्।।४१।। याज्ञिक क्रियाओं के आरम्भ में दो अरणियों (अरहर आदि काष्ठनिर्मित) के मन्थन से अग्नि प्रकट की जाती है, जो डाली गयी सभी आहुतियों को जलाकर भस्म कर देती है। इसी प्रकार दाष्ट्रान्त में, विशुद्ध अन्तःकरण रूपी अरणि में मन उत्तर अरणि के समान है, ध्यान के द्वारा दोनों का नित्य निरन्तर मन्थन करने पर वहाँ उत्पन्न ज्ञानाग्नि की ज्वाला, सम्पूर्ण अज्ञानरूपी ईंधन को अर्थात् कार्य के सहित मूलाज्ञान को सम्पूर्ण रूप से जलाकर भस्मसात् कर देती है। इससे तितिक्षु मुमुक्षु स्वाराज्य में अभिषिक्त होकर कृतकृत्य हो जाता है ॥४१॥ जीव-ब्रह्म के एकत्व के दृढ़ ज्ञान से, अविद्या से परिकल्पित अन्धकार के सम्पूर्ण रूप से नष्ट होने पर परमात्मा स्वयं आविर्भूत हो जाता है। इसे अगले श्लोक से कहते हैं- अरुणेनेव बोधेन पूर्वसन्तमसे हृते। तत आविर्भवेदात्मा स्वयमेवांशुमानिव।।४२।। जैसे सूर्योदय के पहले सूर्यप्रकाश से अन्धकार का नाश होने पर सूर्य प्रकट हो जाता है। उसी तरह ज्ञान से अज्ञानान्धकार का नाश होने पर आत्मा का आविर्भाव हो जाता है ॥४२॥ आत्मा परोक्ष स्वभाव वाला होने से सर्वदा अप्राप्त ही है। वह प्राप्त कब होगा? इसे बताते हैं-