भारतकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

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३८ आत्मा तु सततं प्राप्तो ह्यप्राप्तवदविद्यया। तन्नाशे प्राप्तवद्भाति स्वकण्ठाभरणं यथा।।४३।। सर्वत्र परिपूर्ण, अद्वितीय, आनन्दस्वरूप आत्मा सदा प्राप्त ही है। अज्ञानकृत भ्रान्ति से अप्राप्त के समान भासित होता है। जैसे कण्ठ में धारण की गयी माला, विस्मरण से अप्राप्त के समान होती है। किन्तु आप्त वाक्य सुनते ही भ्रान्ति का अपनय होते ही प्राप्त हो जाती है। ऐसे ही अज्ञानरूपी आवरण काल में अप्राप्त के समान भासित होने वाला आत्मा, महावाक्य श्रवण जन्य ज्ञान से अज्ञान नष्ट होते ही प्राप्त के समान भासित होता है। अत एव शास्त्रों में आत्म-लाभ को 'प्राप्त की ही प्राप्ति' कहा गया है ।।४३।। शङ्का- संसारी जीव परमात्मा से अभिन्न है, यह कहना ठीक नहीं है? समाधान करते हैं- स्थाणौ पुरुषवद्भ्रान्त्या कृता ब्रह्मणि जीवता। जीवस्य तात्त्विके रूपे तस्मिन्दृष्टे निवर्तते।।४४।। जैसे अन्धकार में स्थित स्थाणु आदि में कोई अनजान व्यक्ति 'यह पुरुष है' इस प्रकार की आशङ्का करके भयसंयुक्त होता है। वैसे ही अनादि काल से अविवेक से ब्रह्म में जीवत्व की कल्पना करके प्राणी तरह-तरह के अनर्थों को प्राप्त करते हैं। जब 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों से उत्पन्न विवेक दृष्टि से वह जीव अपने तात्त्विक (पारमार्थिक) स्वरूप को जान लेता है, तो कल्पित होने से जीवभाव की भी निवृत्ति हो जाती है। (तभी 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा जान सकेगा) ।।४४।।