भारतकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

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३६ अहंता-ममता का ज्ञान होते रहने पर एकत्त्वज्ञान कैसे संभव है? इस आशङ्का का समाधान करते हैं- तत्त्वस्वरूपानुभवादुत्पन्नं ज्ञानमञ्जसा। अहं ममेति चाज्ञानं बाधते दिग्भ्रमादिवत् ।।४५।। जैसे दिशाओं के सम्यग् ज्ञान से दिग्भ्रान्ति तुरंत नष्ट हो जाती है। इसी प्रकार तत्त्वस्वरूप के अनुभव से अर्थात् जीव-ब्रह्म की एकता का निरन्तर अभ्यास करने से उत्पन्न दृढ़ ज्ञान सहसा 'मैं' 'मेरा' इस अज्ञान को नष्ट कर डालता है। ऐसा ही तत्त्वज्ञानियों का अनुभव देखा गया है ।।४५।। अहंता-ममता रूपी अज्ञान के नष्ट होने पर योगी (तत्त्वज्ञानी) ज्ञाननेत्र से सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च को आत्मा में ही अभिन्न रूप से देखता है अर्थात् सम्पूर्ण प्रपञ्च को आत्मा में कल्पित जानता है। इसे कहते हैं- सम्यग्विज्ञानवान्योगी स्वात्मन्येवाखिलं स्थितम्। एकं च सर्वमात्मानमीक्षते ज्ञानचक्षुषा ।।४६।। यथार्थज्ञानवान् योगी सर्वाधिष्ठानभूत आत्मा में ही ज्ञान नेत्र से सम्पूर्ण विश्व को स्थित देखता है। जैसे मिट्टी और स्वर्ण से बने पदार्थों को जानकार व्यक्ति उपादान से अभिन्न मानते हैं, वैसे ही। अथवा आत्मस्वरूप होने से मच्छर आदि सभी प्राणियों में नियन्ता रूप से विद्यमान अपने निरतिशय ऐश्वर्य को देखता है। किन्तु अपने ऐश्वर्य में तारतम्य नहीं देखता । इसके अतिरिक्त तिर्यक् आदि अधम योनियों में भी भेदक जाति, गुणादि के न होने से.निरतिशय ऐश्वर्य का दर्शन कर कृतकृत्य हो जाता है ।।४६।।

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