भारतकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 51 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 34

३२ करता है। किन्तु उन बुद्धि आदि से प्रकाशित नहीं होता। जैसे एक दीपक घटादि सभी संनिहित पदार्थों को प्रकाशित कर देता है, उनसे प्रकाशित नहीं होता, उसी तरह ।।२७।। शङ्का - आत्मा अपने प्रकाश के लिए बुद्धि आदि की अपेक्षा रखता है, ऐसा स्वीकार करना चाहिए। उत्तर देते हैं- स्वबोधे नान्यबोधेच्छा बोधरूपतयात्मनः। न दीपस्यान्यदीपेच्छा यथा स्वात्मप्रकाशने।।२८।। आत्मा ज्ञानस्वरूप होने से नित्य प्रकाशित होते रहता है। अपने बोध के लिए अन्य ज्ञान की अपेक्षा नहीं रखता है क्योंकि वह अनुभवस्वरूप है। जैसे दीपक अपने प्रकाशन के लिए अन्य दीपक की अपेक्षा नहीं रखता वैसे ही ।।२८।। यदि बुद्ध्यादि से आत्मा जानने योग्य नहीं है तो आत्मज्ञान का अन्य उपाय बताना चाहिए। वह उपाय क्या है? इसे कहते हैं- निषिध्य निखिलोपाधीन्नेति नेतीति वाक्यतः। विद्यादैक्यं महावाक्यैर्जीवात्मपरमात्मनोः ।।२९।। 'अथात आदेशो नेति नेतीति' इन वेदान्त वाक्यों से तत्त्वं पदार्थगत सम्पूर्ण सर्वज्ञत्व, किञ्चिज्ज्ञत्व, नियन्तृत्व, नियम्यत्व आदि उपाधियों का निषेध कर देने से अर्थात् उन उपाधियों को अनात्मा जानकर निराकरण करके 'तत्त्वमसि' 'अयमात्मा ब्रह्म' 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि वाक्यों के द्वारा भागत्याग लक्षणा से जीव ब्रह्म की एकता को जानना चाहिए। यही आत्मज्ञान का सर्वोत्तम उपाय है ।।२६।।