आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
३२ करता है। किन्तु उन बुद्धि आदि से प्रकाशित नहीं होता। जैसे एक दीपक घटादि सभी संनिहित पदार्थों को प्रकाशित कर देता है, उनसे प्रकाशित नहीं होता, उसी तरह ।।२७।। शङ्का - आत्मा अपने प्रकाश के लिए बुद्धि आदि की अपेक्षा रखता है, ऐसा स्वीकार करना चाहिए। उत्तर देते हैं- स्वबोधे नान्यबोधेच्छा बोधरूपतयात्मनः। न दीपस्यान्यदीपेच्छा यथा स्वात्मप्रकाशने।।२८।। आत्मा ज्ञानस्वरूप होने से नित्य प्रकाशित होते रहता है। अपने बोध के लिए अन्य ज्ञान की अपेक्षा नहीं रखता है क्योंकि वह अनुभवस्वरूप है। जैसे दीपक अपने प्रकाशन के लिए अन्य दीपक की अपेक्षा नहीं रखता वैसे ही ।।२८।। यदि बुद्ध्यादि से आत्मा जानने योग्य नहीं है तो आत्मज्ञान का अन्य उपाय बताना चाहिए। वह उपाय क्या है? इसे कहते हैं- निषिध्य निखिलोपाधीन्नेति नेतीति वाक्यतः। विद्यादैक्यं महावाक्यैर्जीवात्मपरमात्मनोः ।।२९।। 'अथात आदेशो नेति नेतीति' इन वेदान्त वाक्यों से तत्त्वं पदार्थगत सम्पूर्ण सर्वज्ञत्व, किञ्चिज्ज्ञत्व, नियन्तृत्व, नियम्यत्व आदि उपाधियों का निषेध कर देने से अर्थात् उन उपाधियों को अनात्मा जानकर निराकरण करके 'तत्त्वमसि' 'अयमात्मा ब्रह्म' 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि वाक्यों के द्वारा भागत्याग लक्षणा से जीव ब्रह्म की एकता को जानना चाहिए। यही आत्मज्ञान का सर्वोत्तम उपाय है ।।२६।।
३३ आत्मस्वरूप को जानने में अनात्म पदार्थों का निषेध, न करने से क्या क्षति हो सकती है? वास्तव में विचार दृष्टि से देखा जाए तो अनात्म पदार्थों का निरास न करने पर आत्मा जाना ही नहीं जा सकता। जैसे 'यह सर्प है' इस प्रकार रज्जु में भ्रान्ति से आरोपित सर्प का निषेध किए बिना रज्जुज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता। इसी प्रकार अनात्म पदार्थों का निषेध करने पर ही आत्मा ज्ञातव्य है। इस आशय को अगले श्लोक से स्पष्ट करते हैं- आविद्यकं शरीरादि दृश्यं बुद्बुदवत् क्षरम्। एतद्विलक्षणं विद्यादहं ब्रह्मेति निर्मलम्।।३०।। देहेन्द्रियादि सम्पूर्ण दृश्य समुदाय अविद्याका कार्य है, दृश्य होने से, पानी के बुलबुले के समान। यह विनाशी भी है। इससे विलक्षण उपाधियों के संसर्ग से रहित, निर्मल, नित्य, एक, सच्चिदानन्द ब्रह्म मैं ही हूँ, इस प्रकार अनुभव करें। ऐसा जानने से ही कृतकृत्य होगा ।।३०।। एवं उपर्युक्त रीति से अद्वितीय, आनन्दस्वरूप आत्मा को महावाक्यार्थ ज्ञान से अपरोक्ष रूप से जानकर, अपने अनुभव के आधार पर विशुद्ध अन्तःकरण में आत्मविषयक मनन के स्वरूप को पाँच श्लोकों से कहते हैं- देहान्यत्वान्न मे जन्मजराकार्श्यलयादयः। शब्दादिविषयैः सङ्गो निरिन्द्रियतया न च।।३१।। दृश्य, जड़ आदि स्वभाव वाले स्थूल शरीर से भिन्न होने से जन्म, बुढ़ापा, कृशता (पतला होना) और लय (मृत्यु) आदि विकार मुझमें नहीं है। इन्द्रियों से सम्बन्ध न होने से मुझमें शब्दादि विषयों का सङ्ग नहीं, अत एव मुझमें विषय-भोग नहीं हैं ।।३१।।
३४ अमनस्त्वान्न मे दुःखरागद्वेषभयादयः । 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र' इत्यादिश्रुतिशासनात् ।।३२।। आत्मस्वरूप मुझमें मन का अभाव होने से दुःख, राग, द्वेष, भय आदि का अभाव है। आत्मा में इन्द्रिय, प्राण और मन का अभाव कैसे हैं? ऐसी आशङ्का होने पर प्रमाण रूप से श्रुति को प्रस्तुत करते हैं। मुण्डकोपनिषद् की श्रुति कहती है, "अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः।" (मुण्ड २/१/२) ।।३२।। अब अगले तीन श्लोकों से गुरु की प्रसन्नता से अनुभूत ज्ञान को प्रकट करते हैं- निर्गुणो निष्क्रियो नित्यो निर्विकल्पो निरञ्जनः । निर्विकारो निराकारो नित्यमुक्तोऽस्मि निर्मलः।।३३।। मैं बुद्ध्यादि का अभाव होने से निर्गुण, इन्द्रियों का अभाव होने से निष्क्रिय, अविद्या के कार्य से रहित होने से नित्य, मन का अभाव होने से निर्विल्प, अज्ञान का अभाव होने से निरञ्जन, शरीर का अभाव होने से विकाररहित, निरवयव होने से निराकार, नित्यमुक्त तथा निर्मल हूँ ।।३३।। अब अवशिष्ट स्वरूप को अग्रिम श्लोक से कहते हैं- अहमाकाशवत्सर्वबहिरन्तर्गतोऽच्युतः । सदा सर्वसमः शुद्धो निःसङ्गो निर्मलोऽचलः ।।३४।। जैसे आकाश सर्वत्र व्याप्त है, उसी तरह मैं सम्पूर्ण दृश्य समुदाय के बाहर-भीतर व्याप्त, किसी भी प्रकार की च्युति (स्वरूप नाश) से रहित, विषम वस्तुओं में भी समान रूप से स्थित, शुद्ध (निर्लिप्त) तथा पूर्ण होने से अचल हूँ ।।३४।।
पूर्वोक्त श्लोक वर्णित मनन का चिरकाल अभ्यास
३५ पूर्वोक्त श्लोक वर्णित मनन का चिरकाल अभ्यास करने पर पुरुषार्थ की सिद्धि अवश्यम्भावी होती है, इसे दिखाते हैं- एवं निरन्तराभ्यस्ता ब्रह्मैवास्मीति वासना। हरत्यविद्याविक्षेपान् रोगानिव रसायनम्।।३५।। इस प्रकार से निरन्तर 'मैं ब्रह्म हूँ' इसका अभ्यास करने से तज्जन्य दृढ़ संस्कार अविद्याकृत चित्त विक्षेपों को पूरी तरह से नाश कर देता है। जैसे चिरकालतक सेवन की गयी उपयुक्त औषधि रोग को जड़ से निकाल देती है, ठीक वैसे ही ।।३५।। अब जीव-ब्रह्म की एकता को दृढ़ करने के लिए पुनः कथन करते हैं- नित्यशुद्धविमुक्तैकमखण्डानन्दमद्वयम्। सत्यं ज्ञानमनन्तं यत् परब्रह्माहमेव तत्।।३६।। 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियों में जिस नित्य, शुद्ध, विमुक्त, एक, अखण्ड, आनन्दस्वरूप, अद्वितीय परब्रह्म का कथन किया गया है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ। ।।३६।। अब ब्रह्मानुसन्धान संबन्धित कुछ अवश्य पालनीय नियमों को कहते हैं- विविक्तदेश आसीनो विरागो विजितेन्द्रियः। भावयेदेकमात्मानं तमनन्तमनन्यधीः ।।३७।। स्त्री, जन आदि के विक्षेप से रहित विविक्त देश में वैराग्य और इन्द्रियनिग्रह पूर्वक स्थित होकर अनन्यचित्त से उस अनन्त आत्मा का प्रत्यग् रूप से चिन्तन करें। अर्थात् ब्रह्म में ही बुद्धि को स्थिर करे।।३७।।
३६ दृश्य प्रपञ्च के विद्यमान रहते एकत्वभावना कैसे संभव है? इस विषय में बताते हैं- आत्मन्येवाखिलं दृश्यं प्रविलाप्य धिया सुधीः। भावयेदेकमात्मानं निर्मलाकाशवत्सदा ॥३८॥ बुद्धिमान् साधक शुद्ध बुद्धि से आत्मा में ही सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च को लीन करके अर्थात् प्रपञ्चमिथ्यात्व का दृढ़ निश्चय करके, द्वैत का अभाव होने से निर्मल आकाश के समान एक आत्मा की ही भावना करें।।३८।। अब ज्ञानी महापुरुष की स्थिति का वर्णन करते हैं- नामवर्णादिकं सर्वं विहाय परमार्थवित्। परिपूर्णचिदानन्दस्वरूपेणावतिष्ठते।।३९।। परमात्मतत्त्व ज्ञानी महापुरुष सम्पूर्ण नाम, रूप, वर्ण आदि युक्त जगत् का परित्याग करके देश काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित चिदानन्द स्वरूप से अवस्थित हो जाता है ।।३९।। शङ्का- प्रमातृत्व आदि त्रिपुटी (प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय) का ज्ञान जब तक है, तब तक एकत्वभावना कैसे संभव है? समाधान करते हैं- ज्ञातृज्ञानज्ञेयभेदः परात्मनि न विद्यते। चिदानन्दैकरूपत्वादीप्यते स्वयमेव हि।।४०।। ज्ञातृ, ज्ञान, ज्ञेय भेद रूपी त्रिपुटी परमात्मा में बिल्कुल नहीं है। भेद कल्पित आत्मा में ही भासित होता है। आत्मा ज्ञान और आनन्दरूप होने से स्वयं ही प्रकाशित होता है ।।४०।।
३७ इस प्रकार विशुद्ध आत्म वस्तु के ज्ञान से प्रत्यक्ष फल बताते हैं। एवमात्मारणौ ध्यानमथने सततं कृते। उदिताऽवगतिज्वाला सर्वाज्ञानेन्धनं दहेत्।।४१।। याज्ञिक क्रियाओं के आरम्भ में दो अरणियों (अरहर आदि काष्ठनिर्मित) के मन्थन से अग्नि प्रकट की जाती है, जो डाली गयी सभी आहुतियों को जलाकर भस्म कर देती है। इसी प्रकार दाष्ट्रान्त में, विशुद्ध अन्तःकरण रूपी अरणि में मन उत्तर अरणि के समान है, ध्यान के द्वारा दोनों का नित्य निरन्तर मन्थन करने पर वहाँ उत्पन्न ज्ञानाग्नि की ज्वाला, सम्पूर्ण अज्ञानरूपी ईंधन को अर्थात् कार्य के सहित मूलाज्ञान को सम्पूर्ण रूप से जलाकर भस्मसात् कर देती है। इससे तितिक्षु मुमुक्षु स्वाराज्य में अभिषिक्त होकर कृतकृत्य हो जाता है ॥४१॥ जीव-ब्रह्म के एकत्व के दृढ़ ज्ञान से, अविद्या से परिकल्पित अन्धकार के सम्पूर्ण रूप से नष्ट होने पर परमात्मा स्वयं आविर्भूत हो जाता है। इसे अगले श्लोक से कहते हैं- अरुणेनेव बोधेन पूर्वसन्तमसे हृते। तत आविर्भवेदात्मा स्वयमेवांशुमानिव।।४२।। जैसे सूर्योदय के पहले सूर्यप्रकाश से अन्धकार का नाश होने पर सूर्य प्रकट हो जाता है। उसी तरह ज्ञान से अज्ञानान्धकार का नाश होने पर आत्मा का आविर्भाव हो जाता है ॥४२॥ आत्मा परोक्ष स्वभाव वाला होने से सर्वदा अप्राप्त ही है। वह प्राप्त कब होगा? इसे बताते हैं-
३८ आत्मा तु सततं प्राप्तो ह्यप्राप्तवदविद्यया। तन्नाशे प्राप्तवद्भाति स्वकण्ठाभरणं यथा।।४३।। सर्वत्र परिपूर्ण, अद्वितीय, आनन्दस्वरूप आत्मा सदा प्राप्त ही है। अज्ञानकृत भ्रान्ति से अप्राप्त के समान भासित होता है। जैसे कण्ठ में धारण की गयी माला, विस्मरण से अप्राप्त के समान होती है। किन्तु आप्त वाक्य सुनते ही भ्रान्ति का अपनय होते ही प्राप्त हो जाती है। ऐसे ही अज्ञानरूपी आवरण काल में अप्राप्त के समान भासित होने वाला आत्मा, महावाक्य श्रवण जन्य ज्ञान से अज्ञान नष्ट होते ही प्राप्त के समान भासित होता है। अत एव शास्त्रों में आत्म-लाभ को 'प्राप्त की ही प्राप्ति' कहा गया है ।।४३।। शङ्का- संसारी जीव परमात्मा से अभिन्न है, यह कहना ठीक नहीं है? समाधान करते हैं- स्थाणौ पुरुषवद्भ्रान्त्या कृता ब्रह्मणि जीवता। जीवस्य तात्त्विके रूपे तस्मिन्दृष्टे निवर्तते।।४४।। जैसे अन्धकार में स्थित स्थाणु आदि में कोई अनजान व्यक्ति 'यह पुरुष है' इस प्रकार की आशङ्का करके भयसंयुक्त होता है। वैसे ही अनादि काल से अविवेक से ब्रह्म में जीवत्व की कल्पना करके प्राणी तरह-तरह के अनर्थों को प्राप्त करते हैं। जब 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों से उत्पन्न विवेक दृष्टि से वह जीव अपने तात्त्विक (पारमार्थिक) स्वरूप को जान लेता है, तो कल्पित होने से जीवभाव की भी निवृत्ति हो जाती है। (तभी 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा जान सकेगा) ।।४४।।
३६ अहंता-ममता का ज्ञान होते रहने पर एकत्त्वज्ञान कैसे संभव है? इस आशङ्का का समाधान करते हैं- तत्त्वस्वरूपानुभवादुत्पन्नं ज्ञानमञ्जसा। अहं ममेति चाज्ञानं बाधते दिग्भ्रमादिवत् ।।४५।। जैसे दिशाओं के सम्यग् ज्ञान से दिग्भ्रान्ति तुरंत नष्ट हो जाती है। इसी प्रकार तत्त्वस्वरूप के अनुभव से अर्थात् जीव-ब्रह्म की एकता का निरन्तर अभ्यास करने से उत्पन्न दृढ़ ज्ञान सहसा 'मैं' 'मेरा' इस अज्ञान को नष्ट कर डालता है। ऐसा ही तत्त्वज्ञानियों का अनुभव देखा गया है ।।४५।। अहंता-ममता रूपी अज्ञान के नष्ट होने पर योगी (तत्त्वज्ञानी) ज्ञाननेत्र से सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च को आत्मा में ही अभिन्न रूप से देखता है अर्थात् सम्पूर्ण प्रपञ्च को आत्मा में कल्पित जानता है। इसे कहते हैं- सम्यग्विज्ञानवान्योगी स्वात्मन्येवाखिलं स्थितम्। एकं च सर्वमात्मानमीक्षते ज्ञानचक्षुषा ।।४६।। यथार्थज्ञानवान् योगी सर्वाधिष्ठानभूत आत्मा में ही ज्ञान नेत्र से सम्पूर्ण विश्व को स्थित देखता है। जैसे मिट्टी और स्वर्ण से बने पदार्थों को जानकार व्यक्ति उपादान से अभिन्न मानते हैं, वैसे ही। अथवा आत्मस्वरूप होने से मच्छर आदि सभी प्राणियों में नियन्ता रूप से विद्यमान अपने निरतिशय ऐश्वर्य को देखता है। किन्तु अपने ऐश्वर्य में तारतम्य नहीं देखता । इसके अतिरिक्त तिर्यक् आदि अधम योनियों में भी भेदक जाति, गुणादि के न होने से.निरतिशय ऐश्वर्य का दर्शन कर कृतकृत्य हो जाता है ।।४६।।
४० शङ्का- प्रत्यक्षविरोध होने से आत्मा सर्वात्मक नहीं हो सकता। नाना रूप से दृष्टिगोचर इस जगत् को योगी आत्मा से अभिन्न रूप से कैसे देखता है? इसका समाधान करते हैं- आत्मैवेदं जगत्सर्वमात्मनोऽन्यन्न किञ्चन। मृदो यद्वद्घटादीनि स्वात्मानं सर्वमीक्षते॥४७॥ यह सम्पूर्ण जगत् आत्मा का कार्य होने से आत्मरूप ही है। अतः आत्मा से भिन्न कोई भी वस्तु विद्यमान नहीं है। जैसे मिट्टी के विकार घट, सकोरा, कुल्हड़ मिट्टी से भिन्न नहीं होते। अतः योगी आत्मा में सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च को कल्पित देखता है, इस विषय में शंका का कोई अवसर नहीं है। श्रुतियाँ भी कहती हैं, “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् (विकार वाणी के आलम्बन मात्र है, उपादान मिट्टी ही सत्य है।) “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” (यह सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् ब्रह्म ही हैं) इत्यादि ॥४७॥ ऐसा आत्मदर्शी ही जीवन्मुक्त होता है, इसे कहते हैं- जीवन्मुक्तस्तु तद्विद्वान्पूर्वोपाधिगुणांस्त्यजेत्। स सच्चिदादिधर्मत्वं भेजे भ्रमरकीटवत्॥४८॥ शास्त्रों में 'कीट भ्रमर न्याय' प्रसिद्ध है। जैसे कीट क्रियान्तर का परित्याग करके सतत भ्रमर का ध्यान करते हुए उसी शरीर में भ्रमरभाव को प्राप्त होता है। उसी प्रकार मुमुक्षु साधक श्रवणादि साधनों की परिपाक दशा में अनादि अविद्या परिकल्पित स्थूल शरीरादि उपाधियों के धर्मों का परित्याग करके जीवन्मुक्त हो जाता है। वह सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म हो जाता है ॥४८॥ तदनन्तर स्वात्माराम होकर सुखपूर्वक स्थित होता है, इसे बताते हैं-
४१ तीर्त्वा मोहार्णवं हत्वा रागद्वेषादिराक्षसान्। योगी शान्तिसमायुक्तो ह्यात्मारामो विराजते।।४९।। अपरिमित मोह रूपी समुद्र को ज्ञानरूपीनौका से पार करके, मोक्ष के विरोधि राग, द्वेष आदि राक्षसों को मार करके शम दम आदि से विशिष्ट ज्ञानी जीवन्मुक्त पुरुष आत्मा में ही रमण करते हुए स्वराज्य में अभिषिक्त होकर विराजमान होता है ।।४६।। अब जीवन्मुक्त का लक्षण बताते हैं- बाह्यानित्यसुखासक्तिं हित्वाऽऽत्मसुखनिर्वृतः। घटस्थदीपवच्छश्वदन्तरेव प्रकाशते ।।५०।। बाह्येन्द्रियों का विषयों के सम्बन्ध से जन्य अनित्य सुख की आसक्ति का परित्याग करके, आत्मसुखरूप से संपन्न, स्वसाक्षी रूप से आत्मानुभव करने वाला ही जीवन्मुक्त कहलाता है। जैसे घट के भीतर रखा हुआ दीपक भीतर-ही-भीतर प्रकाशित होता रहता है। उसी प्रकार जीवन्मुक्त पुरुष आत्मसुख का अनुभव नित्य करना है। किन्तु अन्यों के द्वारा नहीं जाना जाता ।।५०।। इस प्रकार कहा गया जीवन्मुक्त पुरुष प्रारब्धक्षय होने तक स्थित रहता है। इसे अगले श्लोक से स्पष्ट करते हैं- उपाधिस्थोऽपि तद्धर्मैर्न लिप्तो व्योमवन्मुनिः। सर्वविन्मूढवत्तिष्ठेदसक्तो वायुवच्चरेत् ।।५१।। मननशील जीवन्मुक्त पुरुष देहादि उपाधियों के साक्षीरूप से होने पर भी आकाश के समान उपाधि के धर्मों से लिप्त नहीं होता। सर्वज्ञ होने पर भी प्राकृत (अज्ञानी) मनुष्यों के समान स्थित
अग्रिम श्लोक से बताते हैं-
: ४२ होता है। स्वाभाविक रूप से विषयों की प्राप्ति होने पर भी आसक्ति से रहित होकर वायु के समान विचरण करता है ।।५१।। प्रारब्ध के क्षीण होने पर देहद्वय रूपी उपाधि के लीन होने पर कैवल्य (विदेहमुक्ति) को प्राप्त कर लेता है। इसे अग्रिम श्लोक से बताते हैं- उपाधिविलयाद्विष्णौ निर्विशेषं विशेन्मुनिः। जले जलं वियद्व्योम्नि तेजस्तेजसि वा यथा।।५२।। जैसे जल में जल, आकाश में आकाश और तेज में तेज मिलकर एकाकारता को प्राप्त कर लेता है। उसी प्रकार प्रारब्ध समाप्त होने पर दोनों शरीर नष्ट होते ही तत्त्वज्ञानी मुनि सर्वव्यापक परब्रह्म परमात्मा में निर्विशेष को प्राप्त कर लेता है। अर्थात् अत्यन्त अभिन्न हो जाता है ।।५२।। अब तटस्थ लक्षण के द्वारा ब्रह्म जीव से अभिन्न है, इसे दिखाते हैं- यल्लाभान्नापरो लाभो यत्सुखान्नापरं सुखम्। यज्ज्ञानान्नापरं ज्ञानं तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५३।। जिस ब्रह्म साक्षात्कार रूपी लाभ से बढ़कर कोई लाभ कहीं भी विद्यमान नहीं है। क्योंकि सभी सांसारिक लाभों का अन्तर्भाव ब्रह्मलाभ में ही हो जाता है। ब्रह्मानन्द में ही सभी सांसारिक आनन्दों का अन्तर्धान (अन्तर्भाव) हो जाता है। जिस ब्रह्म सुख से बढ़कर कोई भी सांसारिक सुख नहीं है। क्योंकि ब्रह्म सुख निरतिशय सुख है। जिसके साक्षात्कार से अन्य कोई ज्ञान अवशिष्ट नहीं रहता। वही ब्रह्म है, ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ब्रह्म ज्ञान से ही मोक्ष ही प्राप्ति होती है। अन्य ज्ञान से नहीं ।।५३।।
४३ यद्दृष्ट्वा न परं दृश्यं यद्भूत्वा न पुनर्भवः। यज्ज्ञात्वा न परं ज्ञानं तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५४।। जिसको देख लेने पर अन्य कोई दृश्य शेष नहीं रह जाता, वह ब्रह्म है। क्योंकि उसी में सम्पूर्ण पुरुषार्थों की सिद्धि हो जाती है। जिसकी स्वरूपता को प्राप्त कर लेने पर पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता है। वही ब्रह्म है। जिसके जान लेने पर अन्य कोई ज्ञेय नहीं रह जाता, वही ब्रह्म है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त सभी तो वृथा पाण्डित्य ही है ।।५४।। अब दो श्लोकों से ब्रह्म का स्वरूप लक्षण कहते हैं- तिर्यगूर्ध्वमधः पूर्णं सच्चिदानन्दमद्वयम्। अनन्तं नित्यमेकं यत्तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५५।। जो बायें-दाहिने, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सर्वत्र पूर्ण, सच्चिदानन्द स्वरूप, अद्वितीय, त्रिविध परिच्छेद रहित, नित्य तथा एक ही है, वही ब्रह्म है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ।।५५।। अतद्व्यावृत्तिभेदैस्तु वेदान्तैर्लक्ष्यतेऽव्ययम्। अखण्डानन्दमेकं यत्तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५६।। वेदान्त वाक्यों से अनात्म पदार्थों की व्यावृत्ति के द्वारा जो अव्यय, अखण्ड, आनन्दस्वरूप, एक तत्त्व लक्षित होता है, वही ब्रह्म है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ।।५६।। शङ्का- ब्रह्मा आदि भी निरतिशय आनन्द वाले सुने गये हैं? समाधान करते हैं- अखण्डानन्दरूपस्य तस्यानन्दलवाश्रिताः। ब्रह्माद्यास्तारतम्येन भवन्त्यानन्दिनोऽखिलाः।।५७।।
४४ परब्रह्म परमात्मा अखण्ड आनन्द स्वरूप है। उस आनन्द समुद्र की जरा सी मात्रा का आश्रय लेकर ब्रह्मा आदि सभी जीव आनन्द के तारतम्य से आनन्दित होते हैं। अतः श्रुति कहती है, "एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति।" इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्मा आदि का आनन्द परिच्छिन्न है ॥५७॥ आत्मा ही परम प्रेमास्पद होने से सभी की अपेक्षा प्रियतम होता है, इसे बताते हैं- तद्युक्तमखिलं वस्तु व्यवहारस्त्वतिप्रियः। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म क्षीरे सर्पिरिवाखिले ।।५८।। उस आनन्दस्वरूप आत्मा से सम्बद्ध सभी देहादि वस्तुएँ प्रियतम हो जाती है। आत्मसंयुक्त व्यवहार भी अत्यन्त प्रिय ही होता है। इसीलिए सम्पूर्ण दूध में व्याप्त घृत के समान सर्वगत अत्यन्त प्रिय ब्रह्म ही सबका प्रिय आत्मा है ।।५८।। तब आत्मा को किस प्रकार से सबको व्याप्त करके स्थित हुआ जाने? ऐसी आशङ्का होने पर कहते हैं कि साक्षात् कथन संभव न होने पर भी सत्ता रूप से उसी का भान हो रहा है। अतः 'अनण्वस्थूलम्.........' इस श्रुति के आधार पर समाधान करते हैं- अनण्वस्थूलमह्रस्वमदीर्घमजमव्ययम् । अरूपगुणवर्णाख्यं तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५९।। जो अणु भी नहीं, स्थूल नहीं, ह्रस्व नहीं, दीर्घ नहीं, अजन्मा, अविनाशी तथा रूप-गुण वर्ण और नाम से रहित है, वही ब्रह्म है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ।।५६।।
पुनः ज्ञान के लिए तीन श्लोकों से ब्रह्म का निरूपण
। ४५ पुनः ज्ञान के लिए तीन श्लोकों से ब्रह्म का निरूपण करते हैं- यद्भासा भासतेऽर्कादिर्भास्यैर्यत्तु न भास्यते। येन सर्वमिदं भाति तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।६०।। जिस प्रकाशस्वरूप के प्रकाश से सूर्यादि प्रकाशित होते हैं। परन्तु प्रकाश्य सूर्यादि के द्वारा जो प्रकाशित नहीं होता। जिसके द्वारा सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है। वही ब्रह्म है, ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए। कठोपनिषद्-श्रुति कहती है “न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।” (कठ. २/२/१५) (उस आत्मस्वरूप ब्रह्म का प्रकाशन सर्वप्रकाशक सूर्य भी नहीं कर सकता। इसी प्रकार चन्द्रमा, तारे और विद्युत् भी उस का प्रकाश नहीं कर पाती। उस चैतन्यज्योति आत्मा के प्रकाशित होने पर ही सब प्रकाशित होता है। उसके प्रकाश से ही सब कुछ भासता है) ।।६०।। श्रीमद्भगवद्गीता में भी इसी तथ्य का कथन शब्दान्तर से किया गया है। उसे कहते हैं- न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।।६१।। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से बताते हैं कि मेरे उस तेजस्वरूप परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर पाता है, न चन्द्रमा और न ही अग्नि। जिस वैष्णव (व्यापक) पद को प्राप्त होकर प्राणी वापस नहीं लौटते, वहीं मेरा परम धाम है ।।६१।। पुनः अग्रिम श्लोक से उसी अर्थ को कहते हैं- स्वयमन्तर्बहिर्व्याप्य भासयन्नखिलं जगत्।
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ब्रह्म प्रकाशते वह्निप्रतप्तायसपिण्डवत् ॥६२॥ सर्वस्वरूपभूत ब्रह्म सम्पूर्ण जगत् के भीतर-बाहर व्याप्त होकर प्रकाशित करता हुआ स्वयं प्रकाशित हो रहा है। जैसे तपे हुए लोह के गोले में स्थित अग्नि, गोले को सम्पूर्ण रूप से व्याप्त होकर प्रकाशित करते हुए स्वयं भी प्रकाशित होती है, ठीक वैसे ही ॥६२॥ पुनः स्वरूपभूत ब्रह्म का कथन करते हैं- जगद्विलक्षणं ब्रह्म ब्रह्मणोऽन्यन्न किञ्चन। ब्रह्मान्यद्भाति चेन्मिथ्या यथा मरुमरीचिका ॥६३॥ ब्रह्म जगत् से विलक्षण है क्योंकि वह जगत् का अधिष्ठान है। किन्तु अन्य सभी वस्तुएँ ब्रह्म में ही अध्यस्त होने से ब्रह्म से भिन्न नहीं है। ब्रह्म से भिन्न यदि कुछ भी दिखाई पड़ता है, तो उसे मरुमरीचिका के जल के समान मिथ्या ही जानना चाहिए ॥६३॥ पुनः उसी तथ्य का प्रतिपादन करते हैं- दृश्यते श्रूयते यद्यद्ब्रह्मणोऽन्यन्न तद्भवेत्। तत्त्वज्ञानाच्च तद्ब्रह्म सच्चिदानन्दमद्वयम् ॥६४॥ चक्षु से जो कुछ भी दिखाई पड़ता है, श्रोत्र से जो कुछ भी सुनाई पड़ता है, मन से जो कुछ भी स्मरण किया जाता है, वाणी से जो भी बोला जाता है, तात्त्विक दृष्टि से सब ब्रह्म ही है। श्रुतियों में भी कहा गया है- “न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा। ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः॥” (मुण्डक. ३/१/८)
४७ यह आत्मा चक्षु, वाणी, अन्य इन्द्रियों, तप, कर्म आदि से गृहीत नहीं होता। रागादि मल से रहित ज्ञान के प्रसाद से शुद्ध अन्तःकरण वाला पुरुष ही ध्यान से उस निष्कल आत्मा का साक्षात्कार कर पाता है ।।६४।। शङ्का - यदि ब्रह्म सर्वगत है तो सभी को दिखाई क्यों नहीं पड़ता? समाधान करते हैं- सर्वगं सच्चिदात्मानं ज्ञानचक्षुर्निरीक्षते । अज्ञानचक्षुर्नैक्षेत भास्वन्तं भानुमन्धवत् ।।६५।। अज्ञान नेत्र से विशिष्ट पुरुष सर्व व्याप्त, सच्चिदानन्द अद्वितीय ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं कर पाता। श्रुतियाँ कहती है, "न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्।" -कोई भी इस आत्मा को चर्म-चक्षु से नहीं देख सकता। "तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ।"- दृष्टादृष्ट विषयों से निष्काम पुरुष ही मन आदि इन्द्रियों की प्रसन्नता से जब अपनी आत्मा की महिमा को जान लेता है तो वह शोकरहित हो जाता है। अतः श्रुतियों से सिद्ध होता है कि विवेकी पुरुष ही आत्मा का साक्षात्कार कर सकता है। इसे दृष्टान्त से स्पष्ट करते हैं। जैसे कोई अन्धा व्यक्ति प्रकाशमान सूर्य को भी नहीं देख पाता। उसी प्रकार अविवेकी पुरुष आत्मा को नहीं जान पाता ।।६५।। एवं उपर्युक्त रीति से, अभ्यास से रहित अनुभव संपन्न पुरुष को अनादिकालीन वासनाओं से अज्ञान संभव है। उसका परिहार करने के लिये बार-बार श्रवणादि की आवृत्ति करनी चाहिए। इसे बताते हैं- श्रवणादिभिरुद्दीप्तो ज्ञानाग्निपरितापितः।
४८ जीवः सर्वमलान्मुक्तः स्वर्णवद्द्योतते स्वयम्॥६६॥ जीव शब्द वाच्य साभास अहंकार यहां श्रवण मनन आदि से प्रकाशित होकर, ज्ञानरूपी अग्नि से शोधित किए जाने पर सभी अज्ञानात्मक मल से मुक्त होकर स्वयं ही सम्यक् रूप से प्रकाशित होता है। जैसे स्वर्ण को अग्नि में तपाये जाने पर वह अशुद्धियों को छोड़कर स्वरूपतः प्रकाशित होता है। ठीक वैसे ही ॥६६॥ इस प्रकार शोधित होकर परमात्मस्वरूप जीव हृदयाकाश में स्थित अज्ञानान्धकार का उपसंहार करके सूर्य के समान प्रकाशित होता है। अब इसे बताते हैं- हृदाकाशोदितो ह्यात्मा बोधभानुस्तमोऽपहत्। सर्वव्यापी सर्वधारी भाति भासयतेऽखिलम्॥६७॥ जैसे आकाश में उदित हुआ सूर्य अन्धकार का नाश करके प्रकाशित होता है। वैसे ही हृदयाकाश में उदित हुआ बोधात्मक सूर्य सर्वव्यापक, सर्वाधार, सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मा अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करके सम्पूर्ण प्रपञ्च को प्रकाशित करता है। 'सर्वात्मक ब्रह्म मैं ही हूँ, इस प्रकार सर्वात्मक रूप से प्रकाशित होता है।' श्रुतियाँ भी कहती हैं, "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (सम्पूर्ण दृश्यमान प्रपञ्च निश्चित रूप से ब्रह्म ही है।) इत्यादि ॥६७॥ शङ्का- आत्मज्ञानी को परमात्मज्ञान के प्रतिबन्धक पापों का नाश करने के लिए नाना प्रकार के पदार्थों से याग करना चाहिए? समाधान करते हैं- दिग्देशकालाद्यनपेक्ष्य सर्वगं शीतादिहन्नित्यसुखं निरञ्जनम्। यः स्वात्मतीर्थं भजते विनिष्क्रियः
४६ स सर्ववित्सर्वगतोऽमृतो भवेत् ।।६८।। ।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमच्छङ्कर- भगवत्पादाचार्यविरचित आत्मबोधः।। जो निष्क्रिय परमहंस महापुरुष आत्मरूपी तीर्थ में अवगाहन कर लेता है, वह सर्वज्ञ, सर्वगत विद्वान् परमात्मस्वरूप होने से अमृत हो जाता है। अर्थात् मुक्त हो जाता है। वह आत्मतीर्थ कैसा है? ऐसी आशंका होने पर बताते हैं- जो देश, काल आदि की अपेक्षा न रखकर सर्व व्यापक, शीत-उष्ण आदि दुःखों को हरने वाला परमानन्द का हेतु होने से नित्यसुखस्वरूप, माया के लेप से रहित होने से निरञ्जन है, ऐसे आत्मतीर्थ में ही परमहंस रमण करते हैं। इतर तीर्थ आत्मतीर्थ से विपरीत हैं। अतः आत्मतीर्थ में रमण करने वाले ज्ञानी को कोई भी कर्त्तव्य शेष नहीं रह जाता ।।६८।। (इस प्रकार परमहंस परिव्राजकाचार्य कैलास पीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीमत्स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती द्वारा रचित आत्मबोध व्याख्या समाप्त हुई।) समरीतिर्महातेजाः परब्रह्म सनातनः जयताज्जानकीनाथो वेदवेद्यो महामतिः॥