आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४ परब्रह्म परमात्मा अखण्ड आनन्द स्वरूप है। उस आनन्द समुद्र की जरा सी मात्रा का आश्रय लेकर ब्रह्मा आदि सभी जीव आनन्द के तारतम्य से आनन्दित होते हैं। अतः श्रुति कहती है, "एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति।" इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्मा आदि का आनन्द परिच्छिन्न है ॥५७॥ आत्मा ही परम प्रेमास्पद होने से सभी की अपेक्षा प्रियतम होता है, इसे बताते हैं- तद्युक्तमखिलं वस्तु व्यवहारस्त्वतिप्रियः। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म क्षीरे सर्पिरिवाखिले ।।५८।। उस आनन्दस्वरूप आत्मा से सम्बद्ध सभी देहादि वस्तुएँ प्रियतम हो जाती है। आत्मसंयुक्त व्यवहार भी अत्यन्त प्रिय ही होता है। इसीलिए सम्पूर्ण दूध में व्याप्त घृत के समान सर्वगत अत्यन्त प्रिय ब्रह्म ही सबका प्रिय आत्मा है ।।५८।। तब आत्मा को किस प्रकार से सबको व्याप्त करके स्थित हुआ जाने? ऐसी आशङ्का होने पर कहते हैं कि साक्षात् कथन संभव न होने पर भी सत्ता रूप से उसी का भान हो रहा है। अतः 'अनण्वस्थूलम्.........' इस श्रुति के आधार पर समाधान करते हैं- अनण्वस्थूलमह्रस्वमदीर्घमजमव्ययम् । अरूपगुणवर्णाख्यं तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५९।। जो अणु भी नहीं, स्थूल नहीं, ह्रस्व नहीं, दीर्घ नहीं, अजन्मा, अविनाशी तथा रूप-गुण वर्ण और नाम से रहित है, वही ब्रह्म है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ।।५६।।