भारतकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

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४३ यद्दृष्ट्वा न परं दृश्यं यद्भूत्वा न पुनर्भवः। यज्ज्ञात्वा न परं ज्ञानं तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५४।। जिसको देख लेने पर अन्य कोई दृश्य शेष नहीं रह जाता, वह ब्रह्म है। क्योंकि उसी में सम्पूर्ण पुरुषार्थों की सिद्धि हो जाती है। जिसकी स्वरूपता को प्राप्त कर लेने पर पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता है। वही ब्रह्म है। जिसके जान लेने पर अन्य कोई ज्ञेय नहीं रह जाता, वही ब्रह्म है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त सभी तो वृथा पाण्डित्य ही है ।।५४।। अब दो श्लोकों से ब्रह्म का स्वरूप लक्षण कहते हैं- तिर्यगूर्ध्वमधः पूर्णं सच्चिदानन्दमद्वयम्। अनन्तं नित्यमेकं यत्तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५५।। जो बायें-दाहिने, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सर्वत्र पूर्ण, सच्चिदानन्द स्वरूप, अद्वितीय, त्रिविध परिच्छेद रहित, नित्य तथा एक ही है, वही ब्रह्म है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ।।५५।। अतद्व्यावृत्तिभेदैस्तु वेदान्तैर्लक्ष्यतेऽव्ययम्। अखण्डानन्दमेकं यत्तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५६।। वेदान्त वाक्यों से अनात्म पदार्थों की व्यावृत्ति के द्वारा जो अव्यय, अखण्ड, आनन्दस्वरूप, एक तत्त्व लक्षित होता है, वही ब्रह्म है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ।।५६।। शङ्का- ब्रह्मा आदि भी निरतिशय आनन्द वाले सुने गये हैं? समाधान करते हैं- अखण्डानन्दरूपस्य तस्यानन्दलवाश्रिताः। ब्रह्माद्यास्तारतम्येन भवन्त्यानन्दिनोऽखिलाः।।५७।।

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