भारतकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

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३ "सर्वत्रासौ समस्तं च वसत्यत्रेति वै यतः। ततोऽसौ वासुदेवेति विद्वद्भिः परिगीयते॥" 'वस निवासे' धातु से बाहुलकाद् उण् प्रत्यय करने से वासु शब्द निष्पन्न होता है। वसति, वासयति सर्वमिति वासुः। वासु ही देव परमात्मा ॥१॥ अब मङ्गलाचरण से सूचित अनुबन्धों का कथन करते हैं- साधनचतुष्टयसम्पन्नाधिकारिणां मोक्षसाधनाङ्गभूतं तत्त्ववि- वेकप्रकारं वक्ष्यामः॥२॥ साधनचतुष्टयसम्पन्न अधिकारियों के लिए मोक्ष के साध- ान ज्ञान के अङ्गस्वरूप तत्त्वविवेक प्रकार को हम कहेगें ॥२॥ साधनचतुष्टयं किम्? नित्यानित्यवस्तुविवेकः, इहामुत्रा- र्थफलभोगविरागः, शमादिषट्कसम्पत्तिः, मुमुक्षुत्वं चेति॥३॥ साधनचतुष्टय क्या है? नित्यानित्यवस्तुविवेक, इस लोक और परलोक के समस्त भोग्य पदार्थ तथा सुखभोग के प्रति वैराग्य, शमदमादि षट्सम्पत्ति तथा मुमुक्षुता, यही चार साधन हैं जिनसे साधक वेदान्त-श्रवण का अधिकारी होता है ॥३॥ नित्यानित्यवस्तुविवेकः कः? नित्यं वस्त्वेकं ब्रह्म, तद्व्य- तिरिक्तं सर्वमनित्यमयमेव नित्यानित्यवस्तुविवेकः। नित्यानित्यवस्तुतविवेक क्या है? एक ब्रह्म नित्य वस्तु है, उससे भिन्न सम्पूर्ण विश्व अनित्य है, यही नित्यानित्यवस्तुविवेक है ॥४॥ इहामुत्रार्थफलभोगविरागः कः? इह स्रक्चन्दन वनितादिषु अमुत्र स्वर्गभोगेष्विच्छाराहित्यमेव। इहामुत्रार्थफलभोगविराग क्या है? इस लोग में माला,